कबीरदास ने जब यह कहा होगा कि निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। तब उनको अहसास भी नहीं हुआ होगा कि वर्ष 2026 में निंदक को नियरे राखिए तो दूर की बात है उसको जेल भिजवा दिया जाएगा। गाजियाबाद के एक बड़े जनप्रतिनिधि हैं। लोग कहते हैं कि उनके बारे में कुछ मत कहना, उनकी मानहानि हो जाएगी, फिर वह एफआईआर करा देंगे, और हो सकता है जेल भी भिजवा दें। गाजियाबाद की रातनीति में यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। अब से पहले अगर किसी जनप्रतिनिधि पर कोई सवाल उठाया जाता था, या कोई आरोप लगाया जाता था, तो अमुक जनप्रतिनिधि खुद पर उठाए गए सवालों का जवाब जनता के सामने देता था और स्वंय पर लगे आरोपों का गलत साबित करता था। अखबारों में यदि किसी नेता के विरूद्घ कुछ छपता था तो साक्ष्यों के आधार पर उसका खंडन किया जाता था। साथ ही उस खबर को अपने लिए तमगा भी माना जाता था। अब राजनीति इतनी बदल गई है कि नेता अपनी निंदा सुनने को तैयार ही नहीं हैं। निंदा सुनना तो बहुत दूर की बात है, निंदा करने वाले के खिलाफ केस दर्ज करा दिया जाता है। संभवत: ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि जनप्रतिनिधि द्वारा सयाह या सफेद जो कुछ भी किया जाए उस पर कोई ना सवाल कर सके और ना उंगली उठा सके। लोग पुलिस कार्रवाई से डरकर किसी काम का विरोध ही ना कर सकें। ऐसे में उनको रोकने वाला कोई होगा ही नहीं। हालांकि संभव है कि मेरा यह तर्क सही ना हो। मगर कोई तो वजह रही होगी, यूं ही तो कोई बेवफा नहीं होता। हो सकता है कि जनप्रतिनिधि रहे ही ऐसे माहौल में हों कि उनको अपमान और निंदा में फर्क का पता ही ना हो। उनको हर सवाल मानहानि ही लगती हो। उनको यही लगता हो कि जनप्रतिनिधि से सवाल करने का जनता को अधिकार ही नहीं है। कुछ भी हो सकता है। मगर मैं इतना जरूर कहूंगा कि यह परिपाटी है गलत। अपने विरूद्घ सुनने की आदत हर नेता को होनी ही चाहिए।