अब राजनीति से दूर हो गये पुराने शब्द
राजनीति में अब नये-नये शब्द इजाद होते जा रहे हैं। पांच दशकों से लोग एक शब्द सुन-सुनकर पक गए थे और वो शब्द था सेक्युलर। अब दस साल से किसी भी राजनीतिक दल की जुबान पर सेक्युलर शब्द नहीं है। दरअसल, सेक्युलर शब्द के सहारे कांगे्रस कई चुनाव जीतती रही है। सेक्युलर होने का दावा चुनावों में होता रहा है लेकिन अगर गौर किया जाए तो इसी सेक्युलर शब्द की वजह से आपस में दूरियां भी पैदा हुई है। केवल चुनावी मौसम में कांगे्रस, बसपा और समाजवादी पार्टी अन्य गैर भाजपाई दल सेक्युलर के नाम पर राजनीति करते रहे हैं। जब से केंद्र और यूपी में भाजपा की सरकार आयी है तब ये शब्द हवा हो गया और नया शब्द तुष्टिïकरण बोला जाने लगा। भाजपा नेता की जुबानों पर तुष्टिïकरण शब्द बोला जाता रहा है। अब इस तुष्टिïकरण का जवाब कोई भी गैर भाजपाई दल सेक्युलर शब्द से नहीं दे रहा है। अब ये शब्द गुजरा जमाना हो गया है। इस सेक्युलर शब्द ने आपस में बहुत दूरियां पैदा कर दी। इसमें कोई दोराय नहीं है आज की जो राजनीति चल रही है उससे जो नये-नये शब्द आ रहे हैं चुनाव माहौल भी प्रभावित हो रहा है, हर चुनाव में एक नया शब्द नारा आता है और वो चुनाव का माहौल बदल देता है। २०२२ के यूपी विधानसभा चुनाव और २०२४ के लोकसभा चुनाव में कटोगे तो बंटोगे एक ऐसा नारा निकला जिसने पूरे देश में चुनावी माहौल बदल दिया। लव जेहाद, लैंड जेहाद, जैसे नारे चुनावी माहौल को प्रभावित करने में काफी अहम रहे हैं। अब २०२७ का विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। अब फिर बाबर बाहर आ गया है। कायदे में रहोगे, फायदे में रहोगे और ना जाने कितने नारे अब फिर गूंजने लगे हैं। आपको याद होगा आजादी मिलने से पहले नारों से एक माहौल बनाया जाता था। लेकिन वो नारे सारे देशवासी एक साथ मिलकर लगाते थे। वो देश के लिए नारे लगते थे। लेकिन आज बदलती सियासत में नारों के जरिये केवल आपसी दूरियां ही बढ़ रही हैं। इसलिए जरूरी है कि सब मिलकर देश को कैसे आगे लेकर जाएं इस तरह की सोच होना चाहिए, इस तरह के नारे होने चाहिए तब हमारा भारत और मजबूत होगा। ये बहुत अच्छी बात है कि सेक्युलर शब्द अब गुजरा जमाना हो गया। अब भारत कैसे आगे बढ़े और कैसे मजबूत हो सबको मिलकर ऐसे नारे लगाने चाहिए। जय हिंद