लखनऊ का अग्निकांड
जिन्होंने अभी उम्र के पहले पड़ाव में उज्जवल भविष्य के सपनों के साथ अपनी पहली मंजिल की ओर कदम रखा था और बड़े सपने संजोये थे, मां-बाप की आंखों के तारा थे लेकिन अफसोस भ्रष्टïाचार, लाचार व्यवस्था, लापरवाही की भेंट मासूम चढ़ गये और हर बार की तरह वही कहानी वही राग, कार्रवाई के नाम पर जांच बैठा दी गई, एक्शन के नाम पर सस्पेंशन हो गया, मीडिया में आंसू बहा दिये गये और फिर सब वही पहले जैसा हो गया। सस्पेंशन हुआ ये सबको पता चल गया, लेकिन कब वो बहाल हो जाएंगे ये किसी को नहीं पता, क्या रिपोर्ट आएगी ये भी नहीं पता और जब अगला हादसा होगा तब सब जाग जाएंगे। यही कारण है कि सिस्टम के आगे सब बेबस हैं सब लाचार है और हर बार सभी की लापरवाही सामने आती है। लेकिन दो दिन मीडिया में सबकुछ रहता है उसके बाद सब भूल जाते हैं। जिनके ये मासूम गये हैं उनको जिंदगी भर के लिए ऐसा गम मिला है जब तक वो जिंदा है इस गम को भूल नहीं पाएंगे। दरअसल, सरकारों का काम बस अब केवल दिखावा रह गया है। दूसरे तरह की राजनीति हो रही है एक दूसरे के प्रति नफरत की राजनीति हो रही है बस इससे आगे कुछ नहीं हो रहा है। यदि सरकार सख्त हो, अफसरों पर इस बात का खौफ हो तो उनके खिलाफ कार्रवाई हो तो इस तरह की घटनाएं रोकी जा सकती है। पूरे प्रदेश में एक नहीं लाखों की संख्या में इस तरह के सेंटर चल रहे हैं लेकिन कहीं कोई ना जांच है ना ही कोई उनकी जानकारी है। हर हादसे के बाद शासन-प्रशासन जागता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस अग्निकांड में ऐसी कार्रवाई हो जिससे फिर आगे किसी मां की गोद खाली ना हो और किसी बाप का चिराग ना बुझे। जय हिंद