यह सोचकर कि कहीं ये मुठभेड़ गले की फांस ना बन जाये
कई अफसर जहां ऐसे एनकाउंटर की फरद में नाम कटवाने में सफल भी हो गये वहीं कुछ को बेमन से लिखवाना पड़ा नाम
-विपिन चौधरी-
गाजियाबाद (युग करवट)। कई बार पुलिस द्वारा सराहनीय एवं साहसिक कार्यो में शुमार होने वाले एनकाउंटर विशेषकर फुल एंकाउंटर किस तरह से पुलिस के गले की फंास बन जाते हैंं इसका जीता जागता उदाहरण पिछले कुछ समय के अंदर हुए फुल एनकाउंटरर्स के दौरान उस समय दिखाई दिया कि जब उन मुठभेड़ की फरद में अपना नामक कटवाने के लिये कई एसीपी से लेकर निरीक्षक व उपनिरीक्षक स्तर के अधिकारी जदï्दोजेहद करते हुए दिखाई दिये।
इसे अदालत का खौफ कहें या फिर कहें अन्य कारण इसके पीछे की वजह तो वो अधिकारी ही जानते होंगे लेकिन एक बात जो दिखाई दी कि वह थी कि ऐसे सराहनीय एवं साहसिक कार्य करके मेडल पाने वाले अधिकारियों में होड़ लगी हुई दिखाई देती है कि वो किसी भी जुगत से उस एनकांउटर की फरद में किसी प्रकार अपना नाम जुड़वालें। लेकिन पिछले कुछ माह में हुए तीन फुल एनकाउंटरर्स के समय पुलिस अधिकारियों की यह ललक नहीं दिखाई दी। उलटे वो इन मुठभेड़ के फरद में अपना नाम लिखवाने से हिचकते हुए दिखाई दिये। इन एनकाउंटर्स की फरद में नाम हटवाने में जहां कुछ अधिकारी सफल भी हो गये वहीं कुछ को उच्चाधिकारियों के दवाब की वजह से फरद में अपने नाम बेमन से लिखवाने भी पड़े। सूत्रों के अनुसार जिन अधिकारियों ने बेमन से अपने नाम फुल एनकाउंटरर्स में लिखवा दिये थे उनकी दिलों की धडक़नें उस समय बुरी तरह से धडक़ती हुई दिखाई दी कि जब उन्हें पता चला कि मुठभेड़ के ये मामले न केवल अदालत तक पहुंच गये हैं बल्कि इन मामलों में अदालत मुकदमे दर्ज करने के आदेश भी दे सकती है। इस बात का पता लगते ही उन अधिकारियों ने अदालती झंझट से कैसे बचा जाये इसकी जुगत भिड़ानी शुरू कर दी। उधर उल्टी गंगा बहने की कहावत को चरितार्थ करने का यह मामला पुलिस महकमें में भी चर्चा का विषय बना हुआ है। पुलिस विभाग में हो रही चर्चा में निरीक्षक एवं उपनिरीक्षक स्तर के अधिकारी यह बात करते हुए दिखाई दिये कि पुलिस भी ऐसे में क्या करे कि जब पीडि़त पक्ष व उसके नाते-रिश्तेदारों से लेकर किसी भी वजह से हुई हत्या जैसी संगीन वारदात के बाद हत्यारों अथवा लुटेरों का फुल एंकांउटर करने का दवाब बनाने के लेकर नेताओं से लेकर सोशल मीडिया तक अभियान छेड़ देते हैं वहीं जब पुलिस अपनी जान पर खेलकर हत्यारे अथवा बदमाश को उसके द्वारा चलाई गई गोली का जवाब गोली से देती हैं तो बदमाशों व हत्यारों के परिजन व उनके शुभचिंतकों से लेकर विपक्ष की राजनीति करने वाले पुलिस को दोषी बताकर उसका मनोबल तोडऩे की मुहिम छेड़ देते हैं। सूत्रों के अनुसार पुलिस महकमें में हो रही इस चर्चा ने उस समय जोर पकड़ा कि जब वेव सिटी थाना क्षेत्र में हुई मुठभेड़ में संयुक्त टीम ने २७ लाख कैश लूटने के अभियोग में शामिल जुबेर व समीर नामक दो ईनामी लुटेरों का फुल एनकाउंटर कर दिया। जिसके बाद दोनों मृतकों के परिजनों ने पुलिस की इस कार्रवाई पर सवालिया निशान उठोते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया। पुलिस की इस दुविधा की वजह से जहां कई बदमाश एवं हत्यारे न केवल सही सजा पाने से साफ साफ बच जाते है वहीं पुलिस की इस कार्यशैली का लाभ उठाकर एसे हत्यारे एवं बदमाश पेशेवर अपराधी बनकर समाज के लिये भय का सबïब और पुलिस के लिये सिरदर्द बन जाते हैं। बाद में पुलिस की यह दुविधा जहां अपराध का ग्राफ बढऩे में सबसे अहïम भूमिका निभाती हुई दिखाई देती है वहीं पुलिस विभाग की किरकिरी का सबïब भी बन जाती है।