उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अगले साल होना है। लेकिन माहौल पूरे प्रदेश में चुनावी हो चुका है। चाय की चुस्की के दौरान चल रही चर्चा हो या सैलून पर समय काटने के लिए विचार विमर्श हर जगह बात चुनाव और राजनीतिक पार्टियों को लेकर ही होती है। अब तो नया चलन सोशल मीडिया का है। व्हाट्सएप पर आप कोई संदेश पोस्ट कीजिए थोड़ी देर में बात कहीं ना कहीं से चुनाव तक पहुंच ही जाती है। भारतीय जनता पार्टी के समर्थक सरकार रिपीट होने के तमाम तर्क देकर बड़ी जीत का दावा करते हैं तो विपक्षी दलों के लोग सरकार और जनप्रतिनिधियों की नाकामी गिनाकर भाजपा की सरकार को उखाड़ फेंकने का दावा करते हैं। हां इतना जरूर हैकि मुद्दों की बात ना भाजपा के समर्थक करते हैं ना विपक्ष के। इतना जरूर है कि जब तर्क, कुतर्क की सीमा लांघ जाते हैं तो बात हिन्दु-मुस्लिम तक पहुंच जाती है। उसके बाद कुछ लोग आपा खो बैठते हैं, कुछ अपशब्दों की परीधि से परे चले जाते हैं। उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ही है, इससे तो कोई इंकार कर ही नहीं सकता। गाजियाबाद समेत पूरे प्रदेश में कांग्रेस के हाथ कुछ है नहीं और बसपा पर कुछ बचा नहीं है। इसलिए माना जाता है कि अगर विधानासभा चुनाव में भाजपा को किसी दल से टक्कर मिल सकती है तो वह सपा ही है। इसलिए समाजवादी पार्टी के नेताओं, उसके कार्यकर्ताओं और समर्थकों की जिम्मेदारी कहीं अधिक बढ़ जाती है। समाजवादी पार्टी के नेताओं को अगर जनता का समर्थन वोट के रूप में चाहिए तो आप लोगों को सरकार की गलत नीतियों, असफल योजनाओं और जनता के अहित कह बातों के साथ यह बताइए कि आपको वोट क्यों करें। भाजपा पर, उसके नेताओं पर, जनप्रतिनिधियों पर व्यक्तिगत टिप्पणी करके सपा के लोग जनता का समर्थन प्राप्त नहीं करेंगे बल्कि रहा सहा भी खो देंगे। अब समय बदल चुका है। लोग किसी के बारे में बुरा सुनना पसंद नहीं करते। बदलती राजनीति की हवा को पहचानना बहुत जरूरी है।