नेताओं को अपनी भाषा पर नियंत्रण रखना चाहिए। उन्हें बहुत तोल-मोल कर बोलना चाहिए। यह बात लगभग हर राजनीतिक विश्लेषक, राजनीति का हर जानकार, तमाम पत्रकार और यहां तक की अदालतें भी कहती रहती हैं। कितने ही नेताओं पर उनकी भाषाशैली को लेकर कानूनी कार्रवाई भी चल रही है। इसी कड़ी में एक नाम समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी का भी जुड़ गया है। उनका एक वीडियो बहुत तेजी से वायरल हो रहा है कि जिसमें वह ब्राह्मïण समाज पर आपत्तिजनक बाते कहते दिख रहे हैं। उनके इस वीडियो पर ब्राह्मïण समाज ने तत्काल प्रतिक्रिया दी। राजकुमार भाटी के बयान की निंदा की गई, थानों में उनके खिलाफ तहरीरें दी गईं। यह सबकुछ बहुत तेजी से हुआ। अभी निंदा चल ही रही थी कि राजकुमार भाटी का माफीनामा भी सामने आ गया। उन्होंने अपने बयान की वीडियो जारी करते हुए पूरे ब्राह्मïण समाज से माफी मांगी और अपने बयान पर सफाई भी दी। उन्होंने बताया कि उनकी वीडियो को पूरा नहीं दिखाया गया। पूरी वीडियो सामने नहीं लाई गई, उनके इंटरव्यू के बीच से एक छोटा अंश निकालकर दिखाया गया। पूरा इंटरव्यू देखेंगे तो सच जान जाएंगे। चलिए मान भी लेते हैं कि राजकुमार भाटी के बयान को काटकर दिखाया गया, यह भी स्वीकार है कि उन्होंने माफी मांग ली है। मगर सवाल यह है कि इस घटनाक्रम से जिन लोगों का दिल दुखा, जिनको तकलीफ हुई, क्या उनके दर्द को कम किया जा सकता है। बात पूरी हो या आधी, किसी जाति पर किसी नेता को बोलना ही क्यों है? अगर आपका अपनी वाणी पर संयम नहीं है, आपका अपने शब्दों पर नियंत्रण नहीं है, तो प्रयास करें कि अधिक बोलें ही ना। राजकुमार भाटी के बयान के मामले में भी देखें तो तीर तो कमान से निकल चुका। जनता में राजकुमार भाटी के बयान के जरिए सपा के ब्राह्मïण विरोधी होने का संदेश चल गया। इसके दीर्घ राजनीतिक परिणाम निकलेंगे, जिसका खामियाजा सपा को ही भुगतना होगा। क्योंकि उत्तर प्रदेश चुनावी वर्ष में है। सालभर में विधानसभा चुनाव आ जाएंगे। चुनाव में सपा से ब्राह्मïण समाज सवाल जरूर करेगा। देखना यह भी दिलचस्प होगा कि अब कौन-कौन से ब्राह्मïण नेता सपा से टिकट मांगेंगे।