पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति पर भी बड़ा और प्रभावशाली असर डाला है। यही वजह है सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी अपने राजनीतिक तौर तरीके बदलते दिखाई दे रहे हैं। यह सच भी है कि अब देश के किसी भी राज्य में कोई भी दल दशकों पुराने तौर तरीके अपनाकर चुनाव जीत ही नहीं सकता। अब धर्म विशेष पर आधारित राजनीति करने वालों को अपना ट्रेंड बदलना ही होगा। क्योंकि इस पुराने पड़ चुके टं्रेड को पसंद करने वाले दोनों ही तरफ लोग अब हैं नहीं। आप यह नहीं कह सकते कि किसी एक धर्म में उसी की बात करने वाले दलों को पसंद करने वालों की संख्या बहुत अधिक है। भाजपा भी लगातार चुनाव जीत रही है तो उसके पीछे सबका साथ सबका विकास की नीति भी बड़ा कारक है। सबका साथ सबका विकास की बात ही तो ज्यादातर विपक्षी दल नहीं कर रहे हैं। ममता हों या अखिलेश, केजरीवाल हों या स्टालिन अब एक धर्म को खुश करने के लिए दूसरे धर्म का अपमान की नीति भारत से विदा हो चुकी है। पश्चिम बंगाल में चुनाव हो चुका। अब अगले साल उत्तर प्रदेश और पंजाब में विधानसभा चुनाव होना है। पंजाब में आम आदमी पार्टी के सामने सत्ता बचाए रखने की चुनौती है तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी दस साल के सत्ता के वनवास को समाप्त करना चाहती है। मगर दोनों ही दलों के सामने नीति एक अड़चन बनकर खड़ी है। दोनों दलों पर हिन्दू विरोधी होने के आरोप लगते हैं। इनके नेताओं के बयान इन आरोपों को सार्थक करते दिखते हैं। कई बार आवेश में ऐसी बातें कह दी जाती हैं जिनको कहना आवश्यक होता ही नहीं। ऐसी बातों से खुश कम लोग होते हैं और नाराज अधिक हो जाते हैं। जिसका खामियाजा राजनीतिक दल को भुगतना पड़ता है। अब किसी विशेष जाति या विशेष धर्म के वोटों की बदौलत कोई राजनीतिक दल सत्ता तक पहुंच ही नहीं सकता। इसलिए सपा और आम आदमी पार्टी जैसे दलों को समय रहते अपने व्यवहार और नीति में बदलाव कर लेना चाहिए।