गाजियाबाद (युग करवट)। कल्कि पीठाधीश्वर जगदगुरू आचार्य प्र्रमोद कृष्णम् ने कहा कि गाजियाबाद साहित्यिक शहर था। आज कुछ बिल्डरों के कारण ये पत्थरों का शहर बन गया है। राजनगर एक्सटेंशन में बड़ी-बड़ी इमारतें तो बना गई लेकिन व्यवस्था के नाम पर कुछ नहीं किया गया। आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि शहर का विकास हो ये वो भी चाहते हैं, होना भी चाहिए लेकिन विकास से पहले शहर की खूबसूरती का भी ख्याल रखना, शहर की संस्कृति का भी ख्याल रखना, शहर के साहित्य का भी ख्याल रखना भी बहुत जरूरी है। केवल पत्थरों की इमारतें खड़ी करके बिल्डरों ने नोटों से बोरियां जरूर भर ली लेकिन शहर की संस्कृति को पूरी तरह से खत्म कर दिया। आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि जब गाजियाबाद में लोग आते थे तो एक अजीब सा सकून महसूस किया जाता था। आज बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हो गई, बाहर से लोग आकर बस गये और विकास के नाम पर केवल पत्थरों का शहर बसा दिया गया। कोई साहित्यक और सांस्कृतिक माहौल अब दिखाई नहीं देता। बिल्डरों ने भले ही पत्थरों का शहर बसाकर हजारों करोड़ रुपये कमा लिये हों लेकिन इस शहर में उन्होंने क्या खास किया कुछ नहीं है। जो विरासतें थी गाजियाबाद वो भी अब खत्म हो गई। अब चारों ओर ऊंची-ऊंची इमारतें हैं, जाम हैं, भीड़ है, अगर कोई व्यक्ति रात को राजनगर एक्सटेंशन से आना चाहे तो घंटो जाम से जूझना पड़ेगा। कल्कि पीठाधीश्वर ने कहा कि शहर में अगर कोई घंटाघर से निकले और फिर लालकुएं के जाम में घंटों फंसना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि इस शहर में जनप्रतिनिधियों के रूप में सियासत भी बहुत मजबूत रही है लेकिन शहर की सांस्कृतिक एवं संस्कृति को मजबूत करने के लिए उन्होंने भी कोई पहल नहीं की ये दुख का विषय है।