चर्चा-ए-आम
पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनाव के पहले चरण में जो मतदान हुआ, उसने सबको चौंका दिया। देश की आजादी से लेकर आज तक जितने भी आम चुनाव हुए, चाहे वो लोकसभा के चुनाव रहे हों या विधानसभा के चुनाव रहे हों, किसी में भी इतना अधिक मतदान नहीं हुआ। कुल मिलाकर पहले चरण का मतदान 93 फीसदी रहा और इसमें भी कुछ विधानसभा क्षेत्रों में तो मतदान 95 फीसदी तक पहुंच गया।
अब ये जो औसतन पहले चरण का आंकड़ा 152 सीटों पर निकलकर आया, वो 93 प्रतिशत है। अभी ये 93त्न इतनी बड़ी संख्या है, जबकि 10त्न इसमें से पहले कट भी चुका है, चाहे वो पहली बार में कटा हो या उसके बाद जो स्क्रूटनी हुई हो उसके बाद कटा हो। और बाद में जो 27,00,000 रह गए, जिनकी ट्रिब्यूनल में सुनवाई नहीं हुई, उन सबको मिलाकर संख्या लगभग 1,00,00,000 हैं। अगर उनको हटा भी दिया जाए, तो भी 93 फीसदी इतनी बड़ी संख्या है कि सब हैरान हैं। अब ये 93 फीसदी हुआ क्यों? क्या ये जो चुनाव आयोग ने स्ढ्ढक्र की प्रक्रिया वहां अपनाई, जिस पर लोग काफी नाराज रहे, बड़ी संख्या में वोट कट गई, उसके प्रतिशोध में हुआ? या फिर जो भाजपा का वहां प्रचार चला, जिसमें बड़ी संख्या में भारी लोग वहां गए, सारे प्रदेशों के मुख्यमंत्री वहां पहुंचे, बड़ी संख्या में कैबिनेट मंत्री और सांसद वहां गए, उसको लेकर लोगों में नाराजगी थी या फिर एक चर्चा चलाई गई कि अगर भाजपा आई तो बंगाल के लोगों का मांस-मछली खाना भी बंद हो जाएगा?
क्योंकि भाजपा कहती रही कि अगर इस चुनाव में दीदी निकलकर आ गईं, टीएमसी निकलकर आ गई, तो आप मानिए कि ये सनातन की हार होगी और ये सनातन के लिए आखिरी चुनाव होगा। उधर टीएमसी कह रही है कि क्या भाजपा का सनातन और बंगाल का सनातन अलग है?
क्योंकि इसमें जो पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं, जो शिमला से आते हैं, उन्होंने दिखाया कि वे मछली खा रहे हैं। मंगलवार का दिन था, तो उन्होंने दिखाया कि हमारे यहां कोई रुकावट नहीं है, खाई जा सकती है, सब अपनी मर्जी से खाएं। तो एक चर्चा ये भी चली कि जो लोग सनातन की दुहाई देते हैं, वो मौखिक है। बंगाल का सनातन तो बहुत अलग है।
तीसरा ये रहा कि घुसपैठियों के लिए जो शोर मचा, वो कितनी संख्या में नजर आए, ये सामने नहीं आया। फिर जो भाषा इस्तेमाल की गई, वो भी बंगाल के लोगों को नागवार गुजर रही थी। तो मूल्यांकन करना बड़ा मुश्किल हो रहा है कि ये इतना बड़ा मतदान किसलिए हुआ। तो सरकार टीएमसी की है, उसको बनाए रखने के लिए हुआ या उसको हटाने के लिए? या भाजपा को लाने के लिए हुआ या भाजपा को रोकने के लिए?
दूसरे चरण का चुनाव अब 29 तारीख को है। अब दूसरे चरण में क्या यही स्थिति बनी रहेगी जो पहले चरण की थी? पहले चरण में 152 सीटों पर मतदान हुआ और अब बाकी सीटों पर होना है। कुल 52 फीसदी सीटों पर मतदान हो चुका है।
तो अगर यही स्थिति बनी रहती है, तो ये सबको एक ऐसी स्थिति में ला रही है कि कोई मूल्यांकन नहीं कर पा रहा है। चुनाव इतनी बड़ी संख्या में ग्रामीण क्षेत्रों में भी हुआ और उतनी ही बड़ी संख्या शहरी क्षेत्रों में भी थी। महिलाएं तो लंबी-लंबी कतारों में खड़ी थीं और सुबह 6 बजे मतदान शुरू होना था, लेकिन लोग 4 बजे से ही कतार में लग गए थे।
सबसे बड़ी उपलब्धि इस पहले चरण के चुनाव में ये रही कि जो आमतौर पर बंगाल में पहले होता था—हिंसा, मारपीट, खून-खराबा—वैसा कुछ इस बार नजर नहीं आया। काफी हद तक, अगर बंगाल के नजरिए से देखा जाए, तो चुनाव शांतिपूर्ण रहा। दो-चार घटनाएं हुईं।
इमायू कबीर, जो वहां बाबरी मस्जिद बना रहे थे, उन पर मुस्लिम मतदाता काफी नाराज हुए। उनका घेराव हुआ, उनकी गाड़ी को तोड़ा-फोड़ा गया। और एक-दो जगह छुटपुट घटनाएं हुईं, जो आम तौर पर अन्य प्रदेशों के चुनावों में भी देखने को मिलती हैं।
जिस हिसाब से तैयारी की गई थी, वो अभूतपूर्व थी। 25 बटालियन केंद्रीय सुरक्षा बल वहां लगाए गए। 2,30,000 सुरक्षा बल तैनात किए गए। 90 फीसदी अधिकारी बदल दिए गए—चीफ सेक्रेटरी से लेकर पुलिस महानिदेशक, गृह सचिव और बड़ी संख्या में ढ्ढ्रस् और ढ्ढक्कस् अधिकारियों के लगभग 500 तबादले हुए।
एकदम नया प्रशासनिक ढांचा नजर आया, जो चुनाव आयोग ने तैनात किया। इतनी बड़ी व्यवस्था के बीच स्वाभाविक है कि हिंसा करने की हिम्मत कोई नहीं कर पाया।
ये एक बहुत बड़ा सकारात्मक पहलू रहा इस पहले चरण के चुनाव में। ऐसा ही निस्संदेह दूसरे चरण में भी होगा। लेकिन फिर बात वहीं आती है कि ये इतना बड़ा मतदान—92-93 फीसदी, कहीं-कहीं 95 फीसदी—किधर जा रहा है, वो किस करवट बैठेगा।
परिणाम 4 मई को आएंगे, लेकिन इतिहास रचा गया है। इस बात को लेकर अभूतपूर्व मतदान हुआ है। और अगर परिणाम चौंकाने वाले आए, तो एक नया इतिहास और रचा जाएगा।
कि लोकतंत्र निस्संदेह बंगाल में जीवित है और भारत में लोकतंत्र की जड़ें अभी भी गहरी हैं। हम यह नहीं कह सकते कि हमारे देश में लोकतंत्र खतरे में है।