लेंसकार्ट की सर्विस गाइडलाइन को लेकर देशभर में विरोध हो रहा है। गाजियाबाद से लेकर देहरादून तक लेंसकार्ट के शोरूम में लोगों ने विरोध दर्ज कराया है। मगर सवाल यह है कि क्या लेंसकार्ट के प्रबंधकों और संचालकों पर कोई असर पड़ा है? गाजियाबाद में पूर्व मेयर अशु वर्मा ने स्थानीय स्तर पर लेंसकार्ट के विरूद्घ ऑपरेशन सिंदूर चलाने तक की चेतावनी दे दी। अगर आपको मामला पैदा नहीं है तो पहले उसे समझ लीजिए। किसी ने लेंसकार्ट की सर्विस बुक के बायलॉज का वह पार्ट सार्वजनिक कर दिया जिसमें कुछ विवादित शर्तें थीं। इन शर्तों में कहा गया कि लेंसकार्ट के कर्मचारी माथे पर तिलक नहीं लगाएंगे, कलाई पर कलावा नहीं बांधेंगे, महिलाकर्मी का सिंदूर नहीं दिखना चाहिए, मगर हिजाब पहनकर काम कर सकती हैं। लोगों को जब इस बारे में पता चला तो उन्हें महसूस हुआ कि लेंसकार्ट हिन्दू विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है। भारत जैसे देश में ऐसी चीजें बर्दाश्त नहीं की जा सकती, इस तरह की बातें करके लोग लेंसकार्ट के शोरूम जाकर अपना विरोध दर्ज कराने लगे। लेंसकार्ट के कर्मचारियों को तिलक लगाए गए, कलावा बांधा गया, जय श्रीराम के नारे लगाए गए। पर मेरा सवाल यह है कि जब लेंसकार्ट ने यह सर्विस गाइड लाइन जारी की तो क्या लेंसकार्ट के किसी कर्मचारी ने विरोध जताया? किसी ने विरोध में नौकरी से इस्तीफा दिया? जिन भी लोगों ने लेंसकार्ट के उत्पाद खरीदे क्या उन्होंने विरोध स्वरूप उनको फेंका? क्या ग्राहकों ने लेंसकार्ट का बायकॉट किया? और सबसे बड़ा सवाल क्या केन्द्र या राज्य सरकार ने इस कृत्य के लिए लेंसकार्ट के खिलाफ कोई कार्रवाई की? क्योंकि यदि ऐसा किसी स्कूल में हो जाता तो क्या सरकारी स्तर पर एक्शन नहीं ले लिया जाता? कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई, कोई नोटिस नहीं दिया गया? इतनी बड़ी घटना हो गई और लेंसकार्ट पर बुलडोजर नहीं चला? इसकी वजह क्या है? किसी पाठक के पास कोई जानकारी हो तो अवगत जरूर कराया जाए।