जो लोग पचास साल की उम्र के करीब हैं उनको याद होगा कि प्रारंभिक शिक्षाकाल में एक किताब नैतिक शिक्षा की भी हुआ करती थी। इस किताब से बालक को बाल्यकाल से ही पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों का ज्ञान दिया जाता था। महापुरूषों के चरित्र पढ़ाकर उन्हें एक अच्छा नागरिक बनाया जाता था। अपने से छोटे का मान और बड़ों का सम्मान करना सिखाया जाता था। यह नैतिक शिक्षा का ही प्रभाव था देश में हर काल में महापुरूष होते रहे। बच्चों को ग से गणेश पढ़ाया जाता था, ताकि उसकी नींव ही नैतिकता से परिपूर्ण हो सके। धीरे-धीरे समय बीता और सरकारों ने हमारी शिक्षा पद्घति में बदलाव करना शुरू कर दिया। अब तक ग से गणेश पढक़र अपनी आध्यात्मिक शक्ति को बढ़ा रहे थे, मगर अब नई शिक्षा पद्घति हमें सिखा रही थी कि गणेश धर्म निरपेक्षता के लिए सही नहीं है इसलिए ग से गधा पढ़ाना शुरू किया गया। यहीं से बालकों की बुद्घि भी परिवर्तित होने लगी। पिछले दस साल में ही देख लीजिए कि समाज में पारिवारिक और सामाजिकमूल्यों का कितना पतन हो चुका है। अब ना छोटे का मान रहा ना बड़ों का सम्मान ही बचा। आज हमारा समाज नैतिक पतन की ओर जा रहा है। वर्तमान पीढ़ी सरकार से बहुत कुछ मांगती रहती है। लोन, रोजगार, छूट, राहत, कमीशन और ना जाने क्या-क्या चाहिए। मगर जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है उस नैतिक शिक्षा की मांग कोई नहीं कर रहा है। जबकि पचास साल के आसपास की उम्र वाले लोग अभी भी नैतिक शिक्षा की महत्ता और इसकी जरूरत को समझ रहे हैं। मगर उनकी बात सुनने को तैयार कौन है? 2019 में केन्द्र में और 2016 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो यकीन हुआ कि शिक्षा के क्षेत्र में भी बदलाव होगा। गुरूकुलों की संख्या बढ़ेगी, बच्चों को नैतिक शिक्षा के माध्यम से पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों की महत्ता सिखाई जाएगी। जनता को यकीन था कि मोदी-योगी के शासनकाल में शिक्षा, व्यापार का एक साधन भर नहीं रहेगी। मगर क्या सच में ऐसा कुछ हो सका? जब आईपीसी बदली जा सकती है तो भला शिक्षा क्यों नहीं?