कसाना निवास
चाय की चुस्कियों के बीच होती हैं कई गंभीर मुद्दों पर चर्चाएं
गाजियाबाद (युग करवट)। आज के दौर में जहां लोगों के पास परिवार के लिए भी समय नहीं है ऐसी भागदौड़ भरे दौर में अगर कोई चार यार बैठकर एक दूसरे से ज्ञान का आदान-प्रदान करें, गंभीर मुद्दों पर चर्चा करें तो समझ लीजिए आज भी रिश्ते निभाने वाले मौजूद हैं। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता पृथ्वी सिंह कसाना के निवास पर लगभग 40 साल से ये मुलाकात और चाय और कॉफी की चुस्कियों का दौर चल रहा है। यहां पर बैठकर जो चर्चाएं होती है वो भी अपने आप में काफी महत्वपूर्ण होती हैं और इस कॉफी क्लब के जो मेम्बर है वो देश की राजनीति में, प्रदेश की राजनीति और कलम की राजनीति में अपना एक बहुत ही अलग स्थान रखते हैं। संख्या बहुत ही सीमित है लेकिन इनकी सोच के पीछे हजारों लोग हैं। 40 वर्षों से पृथ्वी सिंह कसाना और वरिष्ठ पत्रकार राज कौशिक के रिश्ते चले आ रहे हैं। कॉफी और चाय की चुस्कियां लेने वालों में राजनीति के कई बड़े नाम हैं जिनमें पूर्व मंत्री बालेश्वर त्यागी, राजनाथ सिंह के प्रतिनिधि रहे बलदेव राज शर्मा, राज कौशिक आदि शामिल हैं। हालांकि अब पृथ्वी सिंह कसाना राजनगर में शिफ्ट हो गये हैं। आलीशान कोठी में अब बैठने वालों की संख्या में भी बढ़ गई है। भले ही नये लोग जुड़ गये हैं लेकिन जो पुराने दोस्त हैैं वो आज भी कसाना निवास पर उसी तरह आते हैं जिस तरह 40 साल पहले आते थे। पुराना दोस्त और पुराना नौकर एक व्यक्ति की शख्सियत का अहसास कराता है। कल अचानक कसाना निवास पर जाना हुआ तो वहां जो माहौल था, जो सच्चाई थी वो सबसे अलग थी। ना वहां किसी का विरोध था, ना किसी चुगली थी, ना किसी की अमीरी और गरीबी का जिक्र था, जिक्र था तो बस कैसे अपने आप को आज के माहौल में ढाला जाये। इस बैठक की सबसे खास बात ये है कि सभी लोगों के अपने-अपने अलग विचार थे। यहां पर सत्ता पक्ष के समर्थक भी बैठते हैं विपक्ष के समर्थक भी बैठते हैं गर्मागरम बहस भी होती है लेकिन किसी में कोई कड़वाहट देखने को नहीं मिली। 2014 से जो माहौल बदला है उसके बाद मीडिया की सोच भी बदली है नेताओं की सोच भी बदली है इन तमाम बदलाव के बाद भी बहस बहुत होती है लेकिन कहीं कड़वाहट दिखाई नहीं देती यही सबसे बड़ी यहां की बैठक का सार है कि सबकुछ होता है लेकिन ना तो दिल में जहर होता है और ना ही कोई कड़वाहट होती है। आज जरूरत ऐसी ही बैठकों की है जहां एक-दूसरे के साथ खुलकर बात भी हो, ज्ञान का आदान-प्रदान भी हो लेकिन सबकुछ सभ्यता के साथ हो। क्योंकि आज ये दौर खत्म हो गया है अब तो केवल एक-दूसरे को नीचा दिखाने के अलावा कहीं कुछ नहीं है।