अधिकारियों की उदासीनता व लीपापोती की वजह से
विपिन चौधरी
गाजियाबाद (युग करवट)। मुकदमों की विवेचना पूरी तरह से निष्पक्ष एवं पारदर्शी रहे, वादकारियों को विवेचना की अपडेट समय से मिलती रहे और उन्हें त्वरित न्याय मिले इस पहलू को दृष्टिïगत रखते हुए पुलिस कमिश्नरेट गाजियाबाद में वादी संवाद दिवस की शुरूआत बड़े जोर शोर से हुई थी। इतना ही नहीं वादी संवाद दिवस का दिन बुधवार चुना गया था।
उस समय वादी संवाद दिवस को पूरी तरह से सफल बनाने और उसकी महत्ता को बढ़ाने के लिये पुलिस आयुक्त ने एक मुहिम भी छेड़ी थी। बता दें कि शुरूआती हफ्तों में तो जहां डीसपी से लेकर चौकी प्रभारियों तक ने वादी संवाद दिवस को सफल बनाने के लिये ऐडी चोटी के जोर लगा दिये थे और तमाम एसीपी जहां थानों में होने वाले वादी संवाद दिवस में बढ़ चढक़र उपस्थित हो रहे थे वहीं डीसीपी स्तर के अधिकारी भी वादी संवाद दिवस में होने वाली हर क्रिया की पूरे मनोयोग के साथ मॉनिटरिंग भी कर रहे थे। अधिकारियों की इस सजगता व सक्रियता की वजह से कछ समय तो वादी संवाद दिवस सफलता की और परवान चढ़ता दिखाई दिया। लेकिन शनै शनै जहां अधिकारी उदासीन होते गये वहीं थानेदारों व चौकी प्रभारियों से लेकर विवेचक भी अपने पुराने ढर्रे पर चलते नजर आने लगे। इसका दुष्परिणाम यह रहा कि वादी संवाद दिवस सफलता की ऊंचाइयों और अपने लक्ष्य की प्राप्त करने से पहले ही दम तोड़ता दिखाई देने लगा। वादी संवाद दिवसके माध्यम से वादकारियों को निष्पक्ष, पारदर्शी एवं त्वरित न्याय दिलाने के लिये शुरू की गई यह मुहिम हालिया समय में कितनी कमजोर हो गई है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जहां पहले हर बुधवार को आयोजित होने वाले वादी संवाद दिवस के दौरान सभी थानों एक हजार या उससे भी अधिक उपस्थ्तिि वादकारियों की होती थी और तमाम विवेचक वादकारियों को उनकी विवेचनाओं की अपडेट देकर उन्हें संतुष्टï करते दिखाई देते थे वहीं वादकारियों की संख्या घटते घटते अब दौ सौ के आंकड़े पर पहुंच गई है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि ये आंकड़े तो पुलिस के हैं ऐसा भी हो सकता है कि वादकारियों की संख्या पुलिस के द्वारा दर्शाये गये आंकड़ों से भी काफी कम हो। जी हां यहां यह बात इस लिये कही जा रही है क्योकि हालिया दिों में वादी दिवस के दौरान थानों में उपस्थित होने वाले वादकारियों की संख्या तो आमदिनों से भी कम दिखाई दे रही है।