लीजिए यह खबर आप तक पहुंचा ही दी गई कि चुनाव आयोग में अब सबकुछ ठीक हो गया है और विवाद के मेले में बिछड़े तीनों चुनाव आयुक्त फिर एक बार फिल्मी स्टाइल में गले मिल चुके हैं। मगर क्या वाकई आयोग में अब सब कुछ ठीक ठाक हो गया है? क्या इंडियन एक्सप्रेस की वह खबर जिससे हंगामा खड़ा किया, गलत थी या नाटक का पर्दा गिराने को अब ऊपर से किसी ने चाबुक चलाया है ? देश के तमाम विपक्षी दल चुनाव प्रक्रिया को लेकर बरसों से जो आरोप लगा रहे थे, उन्हें यदि एक बार को दरकिनार कर भी दिया जाए तब भी क्या वाकई जन मानस में चुनाव आयोग को लेकर घुमड़ रहे संदेह के बादल छंट गए हैं अथवा यह मुद्दा अब कोई बड़ा तूफान लाने जा रहा है? बात पक्ष – विपक्ष के आरोप प्रत्यारोप की नहीं वरन् उन 13 करोड़ लोगों के अधिकारों की है जिसे किसी सरकार अथवा दल ने नहीं वरन् संविधान ने यह गारंटी दी है कि उसके मताधिकार पर कोई आंच नहीं आयेगी।
भारत का संविधान अपने नागरिक को केवल एक नागरिक होने का गौरव नहीं देता बल्कि उसे लोकतंत्र में भागीदारी का अधिकार भी देता है। अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार का आधार बनता है तो अनुच्छेद 325 यह सुनिश्चित करता है कि किसी नागरिक को केवल उसकी जाति, धर्म या लिंग के आधार पर मतदाता सूची से बाहर नहीं किया जा सकता। मगर क्या वाकई ऐसा हो रहा है? क्या वोट देने के अधिकार को निभाने की पहली शर्त ही इतनी कठिन हो सकती है कि करोड़ों नागरिकों के नाम ही पहले ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर हो जाएं? क्या इसे केवल एक प्रशासनिक आंकड़ा मानकर आगे बढ़ा जा सकता है? क्या यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है कि इन 13 करोड़ नामों में कितने ऐसे हैं जिन्हें वास्तव में हटाया जाना चाहिए था और कितने ऐसे हैं जो केवल प्रक्रिया, दस्तावेजों या प्रशासनिक चूक के कारण बाहर हो गए? क्या कारण है कि अधिकार नागरिक का है परीक्षा भी नागरिक की ली जा रही है? बेशक फर्जी, मृत, स्थानांतरित या अपात्र मतदाताओं के नाम हटाना चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व है मगर ऐसा कैसे हो सकता है कि एसआईआर के तहत करोड़ों लोगों का मताधिकार छीन लिया गया?
इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम-से-कम 14 बार आयोग की रीति नीति के खिलाफ लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। ये आपत्तियां मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाली, पश्चिम बंगाल में अपील, डिजिटल व्यवस्था और मतदाता डेटा के केंद्रीकरण जैसे विषयों से संबंधित थीं । चुनाव आयुक्तों के भरत मिलाप के बावजूद यह सवाल अब भी जस का तस खड़ा है कि अगर आयोग के दो सदस्य ही कुछ फैसलों की प्रक्रिया पर लिखित आपत्ति कर रहे थे, तो उन आपत्तियों का निपटारा कैसे हुआ ? क्या कारण रहा कि दिल्ली में एसआईआर के दौरान 1.45 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 47.7 लाख नाम ड्राफ्ट रोल से बाहर हो गए और पूर्व उप प्रधानमंत्री, पूर्व उपराष्ट्रपति, विदेश मंत्री और सीबीआई समेत लाखों लोगों को अपने नाम की पात्रता के संबंध में नोटिस भेज दिए गए? क्या यह मामूली बात थी कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर से जुड़े मामलों में 38.20 लाख अपील दाखिल होने की जानकारी चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को दी है। लेकिन उनमें से केवल लगभग 1.02 लाख अपील का ही निपटारा हुआ और 37 लाख से अधिक मामले अभी भी लंबित बताए गए। जबकि दर हकीकत यह है कि इतने अधिक वोटों से ही राज्य में भाजपा ने तृण मूल कांग्रेस पर बढ़त बनाई । इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का यह कहना भी क्या मौजू नहीं है कि मतदाता का नाम सीधे हटाना उसके मताधिकार को प्रभावित करता है? अब जब देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में भी चुनाव सिर पर हैं और एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के पहले ड्राफ्ट के तहत दो करोड़ 88 लाख वोट हटाए जा चुके हैं, किसी बड़े खेल की ओर इशारा तो नहीं करते हैं?
बहरहाल, दावा किया जा रहा है कि आयोग ने अपनी रीति नीति में अनेक सुधार अब कर लिए हैं लेकिन सवाल यह है कि यदि एसआईआर की पूरी प्रक्रिया निर्दोष और निर्विवाद थी, तो इतने महत्वपूर्ण सुधार अब क्यों आवश्यक हुए ? और यदि सुधार अब आवश्यक हैं तो क्या पहले से हटाए गए प्रत्येक नाम की स्वतंत्र समीक्षा भी नहीं होनी चाहिए? बेशक लोकतंत्र का खतरा फर्जी वोट है मगर असली वोट के गायब होना क्या खतरा नहीं है? यकीनन एक फर्जी नाम हटाया गया तो चुनाव की शुचिता बचती है। लेकिन एक वास्तविक मतदाता का नाम गलत तरीके से हट गया तो क्या आम नागरिक का लोकतंत्र से संबंध रह भी पाएगा? और यदि ऐसा लाखों या करोड़ों नागरिकों के साथ हो जाए तो क्या देश में लोकतंत्र रह भी पाएगा? आखिर सवाल हजार दो हजार का नहीं वरन् 13 करोड़ मतदाताओं के संवैधानिक अधिकार का है। यह किसी भी सूरत स्वीकार योग्य नहीं है कि मतदाता अपने वोट के लिए चुनाव के पीछे गिड़गिड़ाता घूमे।