अपनी दिवंगत मां के जन्मदिन पर मेरे बच्चे पिछले कई सालों से रक्तदान शिविर का आयोजन करते हैं। इस बार भी रविवार को शिविर हेतु उन्होंने ब्लड बैंक का संचालन करने वाले कई अस्पतालों से संपर्क किया मगर पता चला कि सभी ब्लड बैंक की भंडारण क्षमता पूरी है और अभी अतिरिक्त मानवीय खून की आवश्यकता नहीं है। यह सुन कर मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ कि क्या ऐसा भी हो सकता है कि खून की पूर्ति आवश्यकता से अधिक हो, यदि ऐसा है तो यह कैसे हुआ? यदि यह बात सच है तो क्या अब मुल्क में किसी को भी खून के लिए अस्पतालों और ब्लड बैंकों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे? सवाल इतने मौजू थे कि इसकी पड़ताल करना लाजमी हो गया। सर्वप्रथम तो मैं आपके समक्ष सरकारी आंकड़ा ही रखना चाहूंगा। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 27 मार्च 2026 को लोकसभा में बताया कि राष्ट्रीय स्तर के अध्ययन के अनुसार भारत में रक्त की अनुमानित चिकित्सकीय मांग सालाना 1.46 करोड़ यूनिट है जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में देश में 1,46,01,147 यूनिट रक्त एकत्र किया गया। वहीं वित्त वर्ष 2025-26 में जनवरी 2026 तक 1,32,33,260 यूनिट रक्त संग्रह की सूचना सरकार के पास है। ये आंकड़े दावा करते हैं कि रक्त संग्रह में देश ने उल्लेखनीय क्षमता हासिल की है। हालांकि यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण नहीं है कि अब हर अस्पताल में पर्याप्त रक्त उपलब्ध है। यह भी साबित नहीं होता रक्त की उपलब्धता पूरे देश में समान ही है। हो सकता है कि किसी बड़े शहर के ब्लड बैंक में एक विशेष रक्त समूह की पर्याप्त यूनिट हों जबकि किसी दूसरे शहर के अस्पताल में उसी समूह के रक्त के लिए परिजनों को परेशान होना पड़ रहा हो। दुर्लभ रक्त समूहों और प्लेटलेट्स की जरूरत के बारे में भी कोई ठोस आंकड़ा नहीं दिया जा सकता मगर फिर भी उपलब्ध आंकड़े चौंकाते तो हैं। क्या ऐसे में भारत में रक्तदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने वाली उन तमाम संस्थाओं और रक्त दानदाताओं को सैल्यूट नहीं किया जाना चाहिए, जिन्होंने इस जादुई आंकड़े तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त किया? इन्हीं प्रयासों के चलते ही तो आज सरकारी अस्पतालों, निजी ब्लड बैंकों और सामाजिक संस्थाओं द्वारा हर साल करोड़ों यूनिट रक्त एकत्र किया जा रहा है।
अब बात विषमताओं की। किससे छुपा है कि रक्त की प्रकृति ही उसे जटिल बनाती है। इसे अनिश्चित काल तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। सामान्य परिस्थितियों में लाल रक्त कोशिकाओं का भंडारण लगभग 35 से 42 दिन तक किया जा सकता है, जबकि प्लेटलेट्स की उपयोग अवधि सामान्यत: पांच से सात दिन होती है। इसलिए जरूरत से अधिक रक्त एकत्र कर लेना ही पर्याप्त नहीं है अपितु समय रहते उसका उपयोग करना भी बड़ी चुनौती होती है। तो क्या इस चुनौती को भी हमने जीत लिया है, शायद नहीं। हालांकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का ई-रक्तकोष पोर्टल रक्त संग्रह, उपलब्ध स्टॉक, मरीजों को जारी की गई यूनिट और अनुपयोगी या समाप्त अवधि वाले रक्त का रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था तो उपलब्ध कराता है। लेकिन इसकी महत्वपूर्ण तथ्यगत सीमा भी समझनी होगी। बेशक सरकार ने लोकसभा ने रक्त की उपलब्धता की बात की मगर यह नहीं बताया कि रक्त की कमी या देर से उपलब्धता के कारण हुई मौतों का आंकड़ा क्या है? इसी तरह पूरे देश में उपयोग अवधि समाप्त होने के कारण नष्ट हुई रक्त यूनिटों की कुल संख्या भी नहीं बताई गई। इसलिए रक्त की बर्बादी का कोई राष्ट्रीय आंकड़ा प्रस्तुत किए बिना यह दावा करना उचित नहीं होगा कि भारत में बड़े पैमाने पर रक्त जरूरत से अधिक उपलब्ध है।
यह भी जरूरी सवाल है कि जब देश में रक्त संग्रह की क्षमता बढ़ रही है, तो रक्त बैंकों के बीच समन्वय कितना प्रभावी है? क्या किसी अस्पताल में उपलब्ध अतिरिक्त रक्त को दूसरे जरूरतमंद अस्पताल तक समय पर पहुंचाने की व्यवस्था पर्याप्त है? क्या प्रत्येक जिले में रक्त के विभिन्न समूहों और घटकों की मांग के अनुसार संग्रह की योजना बनाई जा रही है? इन सवालों के जवाब केवल रक्तदान शिविरों की संख्या बढ़ाने से नहीं मिलेंगे। इसके लिए ब्लड बैंकों के बीच वास्तविक समय में जानकारी साझा करना, रक्त के स्टॉक की निगरानी करना भी आवश्यक होगा। यकीनन भारत ने रक्त संग्रह के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है मगर अब अगली चुनौती इस संसाधन का ऐसा प्रबंधन करने की है, जिसमें रक्त की एक भी उपयोगी यूनिट केवल समन्वय की कमी के कारण व्यर्थ न जाए और किसी मरीज को समय पर रक्त न मिलने की परेशानी का सामना न करना पड़े। आखिरकार, रक्तदान का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होता है, जब किसी का दिया हुआ रक्त किसी दूसरे इंसान की जिंदगी बचा सके।