रामलीलाओं को लेकर अब नई बहस हो गई शुरू
गाजियाबाद (युग करवट)। शहर की रामलीलाओं को लेकर जिस तरह का माहौल चल रहा है पार्टीबंदी और गुटबाजी दिखाई दे रही है और कौन रामलीला करायेगा कौन नहीं करायेगा हर कार्यक्रम में यही चर्चा चल रही है। दरअसल, एक कार्यक्रम में इस बात को लेकर जब चर्चा हुई तो नई बहस शुरू हो गई। बहस में दम भी था दरअसल, रामलीलाएं सरकारी जमीन पर हैं। कुछ का रखरखाव नगर निगम करता है और एक रामलीला कविनगर का अलॉटमेंट जीडीए करता है। सबसे पुरानी रामलीला श्रीसुल्लामल रामलीला एक ऐसी रामलीला है जो सरकारी जमीन पर नहंी है। यहां भी चुनाव को लेकर हर बार बहुत रस्साकशी चलती है और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहता है। क्षेत्रीय सांसद अतुल गर्ग के प्रतिनिधि राजेंद्र मित्तल के प्रयास से श्री सुल्लामल रामलीला विवाद काफी हद तक निपट गया। कविनगर रामलीला इस समय सबसे ज्यादा चर्चाओं में है। बातचीत के दौरान एक बात सामने निकलकर आयी। कविनगर रामलीला सरकारी जमीन पर है और इसका आवंटन निशुल्क जीडीए करता है। जब जीडीए का मैदान है तो फिर करोड़ों रुपए का मेले का ठेका कमेटी कैसे देती है और उस पैसे का क्या होता है। सरकारी जमीन पर कोई मेला लगेगा तो फिर उसका पैसा सरकारी खाते में जाना चाहिए। ये अब चर्चा का नया विषय सामने आया है। भाजपा के कई बड़े नेताओं का भी कहना है कि जीडीए को चाहिए कि कविनगर रामलीला मैदान नगर निगम को सौंपे और फिर नगर निगम ही इसको आवंटित करे और मेले का ठेका भी वही छोड़े। कविनगर के अलावा सभी रामलीलाओं का आवंटन नगर निगम करता है। बहस में ये बात भी सामने आयी कि किसी को कोई भी परेशानी लीला से नहीं है सबको परेशानी मेले से है। करोड़ों रुपए का जो ठेका छोड़ा जाता है इसको लेकर सबसे ज्यादा परेशानी दिखाई दे रही है। ये बात सही भी है कि जब सरकारी जमीन है तो उसका रखरखाव सरकारी विभाग करता है तो फिर उसका आवंटन और का ठेका कमेटी कैसे कर सकती है। बताया गया है कि आने वाले टाइम में अब इन मेलों को लेकर सरकारी विभाग कोई ना कोई गाइड-लाइन जारी करेंगे। निगम का भी प्रयास है कि कविनगर रामलीला भी जीडीए उसे हैंड ओवर कर दे। जब सारी व्यवस्था निगम करता है, सफाई व्यवस्था निगम करता है तो फिर प्राइवेट कमेटी कैसे ठेका छोड़ती है। करोड़ों रुपए कमेटी के खाते में होते हैं उसका कैसे खर्च होता इसका कोई हिसाब भी सार्वजनिक नहीं होता। कितने में ठेका छूटा, कितना खर्चा आया, किसको क्या दिया गया इसका पूरा हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए और जनता को भी जानकारी देना चाहिए फिर दूध-का दूध पानी का पानी होगा। आज स्थिति ये है कि क्या खर्चा हो रहा है, कौन खर्चा कर रहा है ये जनता को जानकारी ही नहीं है। चंद लोगों ने मिलकर कमेटियां बना ली और फिर अपने हिसाब से व्यवस्था कराने लगे। सभी लोगों को ये जानने का अधिकार है कि हो क्या रहा है। बहरहाल, कविनगर रामलीला कमेटी को लेकर एक पक्ष हाईकोर्ट गया है उसमें आठ तारीख लगी थी, जज के अवकाश पर रहने के कारण अब आगे की तारीख लगी है। अब देखना है कि हाईकोर्ट क्या निर्णय देता है।