गाजियाबाद में अंबेडकर रोड पर जवाहर लाल नेहरू युवा केन्द्र है। कविनगर रामलीला मैदान में जानकी भवन है। आजकल गाजियाबाद में दोनों ही बहुत अधिक चर्चा में हैं। कविनगर रामलीला मैदान के जानकी भवन को जीडीए ने सील कर दिया है और जवाहर लाल नेहरू युवा केन्द्र पर प्रशासन और जीडीए जांच कर रहा है, ऐसा कहा जा रहा है। यहां सवाल यह उठता है कि जब दोनों ही स्थान सार्वजनिक उपयोग के हैं, तो फिर इन पर विवाद है क्यों? जवाहर लाल नेहरू युवा केन्द्र तो खेल और विशेष रूप से क्रिकेट का मुख्य केन्द्र रहा है। कितने ही बच्चे और नौजवानों ने जवाहर लाल नेहरू युवा केन्द्र से ही क्रिकेट का ककहरा सीखा है। कितने ही खिलाडिय़ों ने नेहरू युवा केन्द्र के मौदान पर अभ्यास करके एक मुकाम हासिल किया है। फिर अचानक यहां खेल की गतिविधियां सीमित कैसे हो गईं? क्यों राजनीतिक लोगों की दखलअंदाजी एकदम से बढ़ गईं। जहां बच्चे खेलते हैं, खेल सीखते हैं, उस मैदान पर हेलिपैड बनाने की कोशिश क्यों शुरू हो गई? अगर वहां स्थाई हेलिपैड बन गया तो क्या खेल प्रभावित नहीं होगा? सबसे बड़ा सवाल कि इस पर खेलों से जुड़े लोग, संस्थाएं और खिलाड़ी आवाज क्यों नहीं उठा रहे हैं? इसी तरह कविनगर रामलीला मैदान के जानकी भवन में कितने ही सामाजिक कार्य होते रहे हैं। खुद भाजपा भी यहां अनेक कार्यक्रम कर चुकी है। एक बार तो नगर निगम की बैठक भी यहां हो चुकी है। फिर ऐसा क्या हो रहा है कि जीडीए को इसे बंद करना पड़ा। क्या यहां भी राजनीति ही एक वजह है? विधायक संजीव शर्मा को छोड़ कर अन्य कोई जानकी भवन के बचाव में बात नहीं कर रहा है। अगर कहीं कोई विवाद है उसे आपस में सुलझा लेना चाहिए। मगर खेल और सार्वजनिक कार्यक्रमों के स्थलों पर विवाद नहीं होना चाहिए। हां अगर किसी की ईगो सामने आ रही है तो बात अलग ही है। परंतु होनी वह भी नहीं चाहिए।