पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के नगर निगमों में विशेष बोर्ड बैठक बुलाई गई थी। जिसमें नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर विपक्ष की निंदा का प्रस्ताव रखा गया जो पास भी हुआ। गाजियाबाद नगर निगम में हुई बोर्ड बैठक का हाल तो सभी जानते ही हैं। 110 पार्षद हैं गाजियाबाद नगर निगम में और इस अति महत्वपूर्ण बैठक में केवल 60 पार्षद शामिल हुए। आप यकीन कीजिएगा कि भाजपा के भी पार्षद बैठक में नहीं पहुंचे थे, पदेन सदस्यों जिनमें विधायक व सांसद आते हैं उनकी तो बात ही छोड़ दीजिए। कुछ साल पीछे जाएंगे तो याद आ जाएगा कि तक आम बोर्ड बैठक में भी सांसद और विधायक पदेन सदस्य के रूप में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते थे। मगर अब गाजियाबाद नगर निगम के ये पदेन सदस्य नगर निगम जाना ही पसंद नहीं करते। दूसरी तरफ पड़ोसी जनपद मेरठ को देखिए। मेरठ नगर निगम में भी नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर बोर्ड बैठक हुई। मेरठ नगर निगम की बैठक में वहां के सांसद अरूण गोविल, प्रदेश के ऊर्जा राज्य मंत्री सोमेन्द्र तोमर, विधायक अमित अग्रवाल भी शामिल हुए। मेरठ के जनप्रतिनिधियों ने नगर निगम की बैठक और प्रस्ताव के महत्व को ेेसमझा भी और तव्वजो भी दी। मेरठ के जनप्रतिनिधियों ने अपने दायित्व को निष्ठा से निभाया। लेकिन गाजियाबाद के जनप्रतिनिधि ना बैठक को सम्मान दे पाए ना प्रस्ताव के मर्म को ही समझ पाए। इसे एक तरह से गाजियाबाद के जनप्रतिनिधियों की उदासीनता ही कहा जाएगा। गाजियाबाद में कुछ लोग 2024 से पहले सांसद को लेकर ना मिलने जैसे प्रश्न उठाते थे। अब वही लोग जवाब दें कि आजकल उन्होंने सांसद को आखिर बार कब देखा था। नगर निगम के हाउस टैक्स का मामला हो या कोई और जनहित की मुद्दा हो, गाजियाबाद के जनप्रतिनिधि जनता की बात करने में कंजूसी बरतते हैं। इसका कारण क्या है? पता नहीं। मगर इतना तो है कि मेरठ के जनप्रतिनिधि गाजियाबाद वालों से कहीं ज्यादा अच्छे निकले।