विरोध प्रदर्शन का बदला तरीका
लोकतंत्र में आपको बात कहने का अधिकर है, आपको विरोध करने का भी अधिकार है, यह अधिकार आपको संविधान ने दिया है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि आप आजादी के नाम पर कुछ भी कर लें। संविधान से आंदोलन करने वाले भी बंधे जिनके हाथ में लाठी है वो भी बंधे हैं, संविधान सब के लिए बराबर है लेकिन अफसोस इस बात का है कि अब लोकतंत्र के नाम पर सडक़ पर जो कुछ हो रहा है वो सबके सामने है। फैसले लेने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट को है, संसद भवन को है और जनता को है लेेकिन पिछले एक सप्ताह से जो प्रदर्शन और आंदोलन चल रहे हैं उसमें कहीं जनता नहीं है। कांग्रेस का प्रदर्शन सबके सामने है, सीजेपी का प्रदर्शन सबके सामने है, लोकतंत्र में आप किसी को अनुमति ना दें ये भी नहीं होना चाहिए। संविधान में सभी को इजाजत है कि वो अपनी बात सभ्यता के साथ हिंसा से दूर रखकर कह सकते हैं। लेकिन अब स्थिति ये है कि कोई भी आंदोलन हो उसमें हिंसा होना अनिवार्य हो गया है और फिर यहीं से आंदोलन का रूप बदल जाता है। २०१४ के बाद कोई भी बड़ा आंदोलन होता है उसके पीछे विदेशी ताकतों का हाथ बताया जाता है। हालांकि कुछ घटनाओं में ऐसा हुआ भी है। लेकिन सारे आंदोलनों के पीछे विदेशी ताकतें हो ऐसा भी संभव नहीं है। दरअसल, संवाद से बड़ी से बड़ी समस्याएं दूर हो जाती है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि अब आंदोलन करने वालों ने संवाद करने के बदले सडक़ पर आकर अपना विरोध दर्ज कराते हैं। सडक़ पर आने से फैसले कभी नहीं होते। अगर सडक़ पर ही फैसले होते तो फिर अदालतें और संसद भवन की कोई आवश्यकता नहीं होती। संवाद से बड़े-बड़े हल हो जाते हैं। हालांकि सरकार भी संवाद के लिए पहल नहीं करती। किसान आंदोलन भी संवाद नहीं होने की वजह से काफी लंबा चला था। मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर जो आंदोलन विपक्ष ने शुरू किया था यहां भी संवाद की कमी रही। वैसे भी कांगे्रस एक ऐसे मुद्दे को लेकर आंदोलन कर रही है जो पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। सीजेपी भी उसी रास्ते पर चल रही है। हालांकि कांगे्रस और सीजेपी के मुद्दे एक है लेकिन श्रेय लेने के चक्कर में दोनों अलग-अलग रहकर अपने-अपने तरीके से आंदोलन कर रहे हैं। एक बड़ा सवाल ये है कि अगर इन आंदोलनों से कोई हल नहीं निकला, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपने पद से नहीं हटे जिसकी पूरी उम्मीद है कि वो नहीं हटेंगे फिर ये विपक्ष क्या करेगा। वोट चोरी का आरोप लगारा आसान है लेकिन एक बड़े संवैधानिक पद पर आसीन चुनाव आयुक्त के खिलाफ सबूत कहां से लाये जाएंगे। राष्टï्रपति का भी यही कहना है कि वोट चोरी का सबूत दीजिए। अब हवा में कोई बातें नहीं चलती अगर वास्तव में वोट चोरी है तो विपक्ष को मजबूत सबूत देना पड़ेंगे वरना सब आंदोलन केवल फोटो सेशन तक ही सीमित रहेंगे। जय हिंद