आखिरकार पर्दे के पीछे क्या है रणनीति
गाजियाबाद (युग करवट)। चुनावी मौसम में जातीय सम्मेलन अपने आप में एक बड़ा संदेश देते हैं। विधानसभा २०२७ की उल्टी गिनती शुरू हो गई है और ये कहा जाए कि सौ दिन शेष बचे हैं तो गलत नहीं होगा। सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी तैयारी में जुट गये हैं। पार्टी स्तर पर भी विभिन्न राजनीतिक दल जातीय सम्मेलन कर चुके हैं। हालांकि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने जातीय सम्मेलन को लेकर दिशा-निर्देश जारी किये थे। वहीं सामाजिक संगठनों द्वारा चुनावी मौसम में जातीय सम्मेलन के पीछे जरूर कोई ना कोई रणनीति होती है। अभी हाल ही में दो दिन पहले छह सितंबर को गाजियाबाद में परमार्थ समिति के प्रमुख वीके अग्रवाल ने विशाल वैश्य शंखनाद का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में वैश्य समाज की की एकता, समाज की उपेक्षा एवं विभिन्न सामाजिक कुरीतियों के निस्तारण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की बात कही गई थी। कार्यक्रम में वैश्य समाज के लोगों को सम्मानित भी किया गया। शहर में एक माह से प्रचार-प्रसार किया जा रहा था। शहर की पुरानी रामलीला मैदान में इसका आयोजन हुआ। कार्यक्रम में वर्तमान एवं पूर्व सांसदों के साथ वैश्य समाज के तमाम ऐसे लोग बुलाये गये थे जो विभिन्न दलों में हैं लेकिन सब एक मंच पर थे। ये कार्यक्रम पूरी तरह से गैर राजनीतिक था। लेकिन इस कार्यक्रम को लेकर बहुत चर्चाएं चल रही हैं। चुनावी मौसम में जातीय सम्मेलन अपने आप में संकेत और संदेश दोनों ही देते हैं। आयोजक वीके अग्रवाल भी शहर के बहुत ही सम्मानित और सामाजिक व्यक्ति हैं और कई बार उनका भी नाम टिकट को लेकर चर्चा में रहा। हालांकि इस कार्यक्रम से कुछ लोगों ने दूरी भी बनाई। लेकिन भाजपा के महानगर अध्यक्ष से लेकर पूर्व महानगर अध्यक्ष एवं सांसद से लेकर पूर्व सांसद तथा पालिकाओं के चेयरमैन भी कार्यक्रम में मौजूद रहे। ये कार्यक्रम किसी एक पार्टी का नहीं था लेकिन भागीदारी सबसे ज्यादा भाजपा की रही। कांगे्रस के पूर्व एमएलसी हरेंद्र अग्रवाल जहां मौजूद थे वहीं समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और टिकट के प्रबल दावेदार अभिषेक गर्ग की भी मौजूदगी रही। सम्मेलन को लेकर चर्चाएं चल रही है कि ये सम्मेलन क्या समाज की एकता के लिए था, समाज की कुरीतियों को दूर करने के लिए था या फिर किसी के लिए टिकट का माहौल बनाने के लिए था। ऐसी भी चर्चा चल रही है कि वीके अग्रवाल भी इस बार टिकट के दावेदार हैं, हो सकता है इसके पीछे ये भी रणनीति हो। कहने वाले कह रहे हैं कि पूर्व सांसद अनिल अग्रवाल, सपा के टिकट के प्रबल दावेदार अभिषेक गर्ग के लिए कहीं बिसात तो नहीं बिछाई गई थी। तो वही शहर में अपने होर्डिंग्स से एक मजबूत दस्तक देने वाले पिलखुवा नगर पालिका के चेयरमैन विभू बंसल के लिए कहीं कोई माहौल तो नहीं बनाया जा रहा था। क्योंकि शंखनाद को लेकर जो होर्डिंग्स लगे उसमें कई जगह विभू बंसल प्रमुखता से दिखाई दे रहे हैं। बहरहाल, वीके अग्रवाल ने वैश्य समाज को लेकर जो शंखनाद का आयोजन किया नि:संदेह एक माहौल जरूर बन गया है और चुनावी मौसम में जिस तरह समाज की समस्याओं को लेकर आवाज बुलंद की गई है उसका एक अच्छा संदेश जरूर जाएगा। वैसे भी शहर सीट हमेशा वैश्य समाज के पास रही है। चाहे वो वैश्य समाज कांगे्रस से हो, बसपा हो या भाजपा से हो। इसलिए जातीय सम्मेलन को लेकर चर्चाएं हो ना स्वाभविक है क्योंकि सम्मेलन ऐसे समय में किया गया है जब चुनावी मौसम की उल्टी गिनती शुरू हो गई है।