गाजियाबाद (युग करवट)। समाजवादी नेता जेपी कश्यप के मुताबिक भारत के प्रसिद्ध समाजवादी नेता और विचारक डॉ. राम मनोहर लोहिया का एक बेहद लोकप्रिय और ऐतिहासिक कथन है कि जब सडक़ें सूनी हो जाती हैं, तो संसद आवारा हो जाती है। भारतीय राजनीति के महान चिंतक, स्वतंत्रता सेनानी और प्रखर समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया का प्रसिद्ध कथन आज के दौर में भी लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए सबसे बड़ा मार्गदर्शक है। यह विचार केवल एक नारा नहीं, बल्कि जीवंत लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है। जनता की सजावट्टा ही लोकतंत्र की ढाल है। सडक़ों का सूना होना नागरिकों की उदासीनता को दर्शाता है। लोकतंत्र तभी तक सुरक्षित है जब तक जनता अपने अधिकारों और देश की नीतियों के प्रति जागरूक है। डॉ. लोहिया का मानना था कि यदि देश की जनता गलत नीतियों के खिलाफ आवाज उठाना बंद कर देगी, तो संसद और जनप्रतिनिधि निरंकुश हो जाएंगे। श्री कश्यप ने कहा कि एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था केवल मतदान तक सीमित नहीं है। सरकार को सही दिशा दिखाने के लिए जनता का सडक़ों पर शांतिपूर्ण और संवैधानिक रूप से विरोध दर्ज कराना आवश्यक है। आज भी जब देश में किसान, छात्र या आम नागरिक अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण आंदोलन करते हैं, तो डॉ. लोहिया का यह दर्शन उनके संघर्ष को वैधानिक और नैतिक बल देता है। देश के समस्त नागरिकों कि जिम्मेदारी बनती है की देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने को मजबूत करने के लिए सदैव सजग, सक्रिय और सचेत रहें। जंतर मंतर इस बार इस देश का नजरिया बदल देगा, क्योंकि एक ईमानदार दुनिया जंतर मंतर के एरिया में इस देश के बेईमान और भ्रष्ट पॉलिटिकल दुनिया के सामने आकर खड़ी हो गई है। जो अपने हक का जिक्र कर रही है वह कह रही है कि दरअसल हम लौटेंगे नहीं हम अपनी जान हथेली पर लेकर आए हैं। यानी एक ऐसी स्थिति उस ईमानदार दुनिया के सामने जहां पर इस देश के भ्रष्ट और बेईमान सिस्टम ने सब कुछ तहस कर दिया और उस दायरे में इस देश के तमाम पॉलीटिशियंस तमाम पॉलिटिकल पावर्स और संसद तक आकर खड़ी हो गई है। तभी तो पूरा विपक्ष हो या सत्ता पक्ष हो वह किसी तरीके से इस आंदोलन से बाहर निकालने के लिए छटपटा रहा है। दूसरी तरफ ईमानदार दुनिया के पूरे प्योरिटी के साथ आए आंदोलन करते हुए छात्र आंदोलन नहीं बल्कि अपने उसे हक का जिक्र कर रहे हैं। जहां पर उन्हें लगने लगा है कि अगर वह वापस घर लौट गए तो फिर उनकी जिंदगी में बचेगा क्या। यह ऐसा सवाल है जिसका जवाब पुलिस की लाठियां या फिर आंसू गैस के गोले या पॉलीटिशियंस की अपनी राजनीति नहीं दे सकती है। इस खतरनाक मोड़ पर इस वक्त जंतर मंतर खड़ा हुआ है यदि प्रदर्शनकारी बगैर संतुष्ट हुए ही यहां से वह वापस लौटेगी तो फिर जब अगली बार लौट कर आएगा। इसलिए समस्या का अभी ही शांतिपूर्वक समाधान होना ही एकमात्र विकल्प है।