भारत में अदालती कार्रवाई के बारे में सभी जानते हैं। वर्षों से एक ही समस्या सुनते आए हैं कि अदालतों में जजों की संख्या सीमित है और मुकदमों की संख्या बहुत अधिक। साल दर साल मुकदमों की संख्या बढ़ती चली गई। अन्तोगत्वा स्थिति यह हुई कि पहले फास्ट ट्रैक और फिर लोक अदालत से केसों का जल्द सुलाझाने और निपटारा करने की पहल शुरू की गई। अब तो लोक अदालत में एक ही दिन में हजारों वाद निपटा दिए जाते हैं। मगर अभी भी पेंडिग़ मुकदमों की संख्या काबू से बाहर ही है। आप देश के किसी भी राज्य के किसी भी जिले की अदालत चले जाइए, आपको वहां अत्यंत भीड़ मिलेगी ही। लोग परेशान हैं मगर अदालतों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं। पूरा-पूरा दिन अदालत में निकल जाता है, मगर तारीखें मिलने का सिलसिला है कि खत्म ही नहीं होता। ऐसा नहीं है कि केवल अपराध संबंधी मुकदमों की भीड़ है। मुकदमा चाहे दीवानी का हो या फौजदारी का, अब तो आर्थिक अपराध बहुत होने लगे हैं, साइबर क्राइम के केसों की तो बाढ़ सी आ गई है। शायद ही ऐसा कोई दिन होगा जिस दिन साइबर क्राइम की खबर अखबारों की सुर्खी ना हो। अब ऐसे में अगर देश के सीजेआई आपसी सहमति से समाधान निकालने की बात करते हैं, तो इसमें ना कुछ अप्रतयाशित है, ना हैरान कर देने वाला। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का कहना है कि आपसी समझौता अब सिर्फ विकल्प नहीं, बल्कि जरूरी व्यवस्था बन गई है। सीजेआई ने कहा कि विवाद लंबा खींचने के बजाय समाधान पर ध्यान देना चाहिए। बढ़ते कानूनी विवादों के बीच अब समय आ गया है कि अदालतों में लंबी लड़ाई के बजाय आपसी सहमति से समाधान पर ज्यादा ध्यान दिया जाए। उन्होंने कहा कि मध्यस्थता यानी मेडिएशन अब सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि जरूरी व्यवस्था बन चुकी है। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि मामला कहां लड़ा जाए, बल्कि यह होना चाहिए कि विवाद का समाधान कैसे निकाला जाए। लंबे कानूनी संघर्ष से समय, पैसा और संसाधन तीनों का नुकसान होता है। अदालतों में मामलों का बोझ लगातार बढ़ रहा है और ऐसे में वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली बेहद जरूरी हो गई है। इससे दोनों पक्षों के रिश्ते भी बेहतर बने रहते हैं और फैसले लंबे समय तक टिकाऊ साबित होते हैं।