गर्मी अपने चरम पर आ चुकी है। लू के थपेड़े झेलने पड़ रहे हैं। डाक्टर सलाह दे रहे हैं कि जरूरत पडऩे पर ही धर से निकलें। मगर घर से निकलना भी तो मजबूरी है, वरना असंख्य ऐसे लोग हैं जो अगर घर से ना निकले तो चुल्हा नहीं जलेगा। मजबूरी किसी भी परेशानी पर भारी पड़ती है।
इस मौसम में जरूरत केवल मौसम की मार से बचने की नहीं है। कई और बातें भी हैं। क्योंकि दोपहर में अधिकांश गलियों सूनी हो जाती हैं। ढूंढने से भी कोई आदमी नजर नहीं आता। कोई आपके गेट पर पानी मांगने आ सकता है। आप दरियादिली दिखाकर गेट खोल दें और किसी वारदात का शिकार बन जाएं। इसलिए किसी अनजान की सहायता के लिए बेहद सावधानी बरतें। इसके लिए आप अपने घर के बाहर मटका आदि लगा सकते हैं ताकि जरूरतमंद की प्यास भी बुझ जाए और आप सुरक्षित भी रह सकें। आपका मानवता का काम भी हो जाए और किसी दुर्घटना से भी बचा जा सके। पहले तो लोग पेड़ लगाएंगे नहीं, लगा देंगे तो उसकी केयर नहीं करेंगे। फिर कहीं जाते हैं गाड़ी खड़ी करने के लिए पेड़ ढूंढते फिरते हैं। गांवों में अब शहरों के मुकाबले पेड़ कम हो रहे हैं।
पहले प्रत्येक घेर या अहाते में कम से कम एक नीम का पेड़ तो दिख ही जाता था। अब किसी घेर में पेड़ नहीं है, क्योंकि परिवार बढऩे पर घर बना लिए गए हैं। पेड़ नहीं होने से सबसे ज्यादा तकलीफ में जीव जंतु आ गए हैं। इसलिए अपने घर की खिडक़ी पर, बालकनी में किसी छांव की व्यवस्था करें ताकि पक्षियों के लिए पानी रखा जा सके। खुले में पानी रखेंगे तो वह गर्म हो जाएगा और पक्षी उसे पीं नहीं पाएंगे। आप खुद भी बाहर निकल रहे हैं तो अपने साथ पानी अवश्य रखें। कुछ हल्का खाना भी रखें। जहां तक संभव हो छांव में रहने का प्रयास करें। हालांकि काम करना बहुत जरूरी है, मगर थोड़ी केयर तो खुद की करनी ही पड़ेगी।