किस बात का प्रतिनिधित्व
चुनाव के दौरान उम्मीदवार चाहे वो किसी भी दल का हो जिस तरह सुनहरे सपने जनता को दिखाते हैं और फिर उन उम्मीदवारों में जो जीत जाता है और अगर उसकी सरकार आ जाती है तो फिर जनता के साथ वही जनप्रतिनिधि तमाम वायदे भूलकर खामोश हो जाता है। उसके मुंह पर सत्ता की चाबी ताला लगा देती है। जबकि जिस सत्तारूढ़ दल का जनप्रतिनिधि होता है उससे जनता को कुछ ज्यादा ही उम्मीदें होती है और होना भी स्वाभाविक है। विपक्ष वाला जनप्रतिनिधि ये कहकर अपनी जान छुड़ा सकता है कि उसकी सरकार नहीं है वो कुछ नहीं कर सकता। लेकिन सत्तारूढ़ दल का जनप्रतिनिधि कैसे जान छुड़ा सकता है। कितनी बड़ी विडम्बना है कि सरकार किसी भी दल की बनी हो सत्तारूढ़ दल का जनप्रतिनिधि कभी नहीं बोलता। उसका एक ही जवाब होता है वो अपनी ही सरकार के खिलाफ कैसे बोले और यहीं से सीधा जनता के साथ विश्वासघात शुरू होता है। जनता से जब वोट मांगता है सीधा यही कहता है कि उसकी समस्या मेरी समस्या। वो जनता के बीच में कहता है कि आधी रात को भी आवाज दोगे तो मुझे खड़ा पाओगे। वो ये भी कहता है कि सरकार आने पर वो तमाम समस्याएं दूर करा देगा। लेकिन ऐसा होता नहीं है। सत्तारूढ़ दल का जनप्रतिनिधि गांधी जी के बंदर बन जाते हैं। आज आलम ये है कि महंगाई आसमान छू रही है, लोगों को गैस नहीं मिल रही है, लंबी-लंबी लाइनें लगी है, प्रशासन दावे करता है कि सबकुछ ठीक है लेकिन कोई भी जनप्रतिनिधि ना तो अफसर से बात कर रहा है और ना ही जनता का दर्द समझ रहा है। जिस जनता के वोट माननीय का तोहफा दिया, उपाधि दी उसी वोट बैंक को आज जनप्रतिनिधि भूलते हैं जा रही है। अगर गाजियाबाद की ही बात करें तो निगम से लेकर हर जगह भाजपा का ही वर्चस्व है उसी का ही बहुमत है लेकिन कोई भी जनप्रतिनिधि किसी एक समस्या के समाधान कराने को लेकर जनता के साथ खड़ा दिखाई नहीं दे रहा है। आखिरकार ऐसा क्यों होता है। चाहे बसपा की सरकार हो, चाहे सपा की सरकार रही हो या आज भाजपा की सरकार है जनप्रतिनधि क्यों जनता के साथ धोखा करते हैं। चुनाव में जो वायदे होते हैं उन पर क्यों खरे नहीं उतरते। अगर सत्तारूढ़ दल के जनप्रतिनिधि आवाज बुलंद करेंगे तो जाहिर है उनकी सुनवाई होगी, जनता से किया वायदा पूरा होगा। ये जनप्रतिनिधि ये क्यों भूल जाते हैं कि हर पांच साल बाद फिर जनता की अदालत में खड़ा होना होगा। अगर वास्तव में सच्ची सेवा करना है और अपने चुनाव वायदे पूरा करना है तो जनप्रतिनिधियों को जनता के साथ खड़ा होना पड़ेगा। स्थिति तो ऐसी हो गई है कि जिस क्षेत्र में जनप्रतिनिधि को वोट नहंी मिलते उस क्षेत्र के लोग जब जनप्रतिनिधि के पास जाते हैं तो जवाब होता है आपने हमें वोट नहीं दिया। ठीक नहीं दिया होगा लेकिन जिसने दिया उसके साथ तो विश्वासघात ना करें। यही कारण है कि राजनीति इस तरह की हो गई है कि अब भरोसे का टोटा होता जा रहा है। इसका कारण यही है कि चुनाव में जो वायदे होते हैं वो जमीनीतौर पूरे होते ही नहीं है। जय हिंद