मैं स्वीकार करता हूं कि मुझे कूटनीति समझ नहीं आती। जो आजकल दिख रहा है, यदि वही कूटनीति है मैं इसे समझना भी नहीं चाहूंगा। कम से कम भारत अमेरिकी संबंधों को लेकर तो कतई नहीं। वहां का राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत का अपमान पर अपमान किए जा रहा है और हम कूटनीति का हवाला देकर मुंह में दही जमाए बैठे हैं? अब तो हद हो गई और वो हमारे देश को नर्क का द्वार बता रहा है। भारतीय को लैपटॉप वाला आतंकी कह रहा है और दावा कर रहा है कि हम लोग नवें महीने की गर्भवती अपनी बीवियों को लेकर अमेरिका आ जाते हैं ताकि होने वाले बच्चे को अमेरिकी नागरिकता दिला सकें। ऐसा भी नहीं है कि यह पहली बार हो जब उसने भारत को जलील किया हो । अपने दूसरे कार्यकाल में तो वह लगभग हर रोज ही पानी पी पी कर हमें कोसता है। कभी कहता है कि मैंने ही भारत पाकिस्तान के बीच सीजफायर कराया तो कभी हमें मृत अर्थव्यवस्था बताकर जबरदस्त टैरिफ लगा हमारी अर्थव्यवस्था को चौपट करने का जतन करता है। कभी ईरान से हमे तेल लेने पर प्रतिबंध लगा देता तो कभी रशिया से तेल लेने और ट्रेड डील के नाम पर हमारी बांह उमेठता है। कभी भारतीयों को हथकडिय़ों और बेडिय़ों में जकड़ कर वापिस भेजता है तो कभी दशकों से वहां रह रहे हिंदुस्तानियों के वीजा पर नई बंदिशें लगा देता है। वह भी तब जब हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसे अपना दोस्त कहते हुए नहीं थकते और उसके चुनाव में प्रचार करने तक अमरीका पहुंच जाते हैं मगर एहसान फरामोशी देखिए कि यही ट्रंप कहता है कि मैं चाहूं तो मोदी का करियर बर्बाद कर सकता हूं। अपनी समझ से परे है कि हमारे मोदी जी हर बार अपमान का कड़वा घूंट चुपचाप क्यों पी जाते हैं और सडक़ से लेकर संसद तक उसका नाम तक लेने से घबराते हैं ? इक्कीसवीं सदी के दूसरे हिटलर इस ट्रंप को इटली, इंग्लैंड और स्पेन जैसे छोटे छोटे देश भी अब उसी की भाषा में पलट कर हडक़ा देते हैं और ईरान जैसा मामूली मान लिया गया देश भी उसे धूल चटा देता है मगर पता नहीं क्यों हम अपना मुंह खोलने से भी डरते हैं ? हैरानी तो तब हुई जब ट्रंप की तमाम बकवास पर तो हमारे प्रधानमंत्री ने मुंह नहीं खोला और अब जब उसकी एक बैठक में गोली चलने की झूठी सच्ची खबर क्या आई कि मोदी जी मचल उठे और चिंता व्यक्त करने का बयान जारी कर दिया ? क्या इसे ही कूटनीति कहते हैं? यदि हां तो भाड़ में जाए ऐसी कूटनीति और साथ ही जाएं ऐसी कूटनीति के नामलेवा भी ।
किताबों में पढ़ा था कि कूटनीति का मूल उद्देश्य अपने देश की संप्रभुता, सम्मान और हितों की रक्षा करना होता है मगर यहां तो अमेरिका के आगे झुकते झुकते भारत की पीठ में ही अब बल पड़ते जा रहे हैं। हमारे नेता ट्रंप के हर तमाचे के बाद बयान देते हैं, ‘भारत-अमेरिका संबंध ऐतिहासिक ऊंचाइयों पर हैं।’ यह वैसा ही है जैसे कोई आदमी रोज़ पड़ोसी से पिटे और शाम को कहे ‘रिश्ते बहुत मधुर हैं।’ क्या यह आरोप सत्य तो नहीं कि ट्रंप के हाथ में मोदी जी की कोई नस लग गई है वरना और क्या वजह हो सकती है कि बाकी किसी देश के तो मामूली से कटु बयान पर भी भारत सरकार तिलमिला जाती है मगर अमेरिका द्वारा लगातार किए जा रहे अपमान पर हम यूं दिखाते हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं। आह! वो भी क्या दिन थे जब कभी भारत गुटनिरपेक्ष था। इसी अमेरिका को हमारे नेताओं ने बार बार उसकी औकात दिखाई । मगर अब पता नहीं क्या हुआ? आज स्थिति यह है कि रास्ता बेशक हम अपना बताएं मगर ट्रैफिक सिग्नल वाशिंगटन से कंट्रोल हो रहा है। उस पर भी तुर्रा यह है कि हर बार कमर में पड़ते नए बल को ‘रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक’ कहा जाता है। माना कि कूटनीति में समझौते जरूरी हैं, लेकिन आत्मसम्मान भी तो कोई चीज़ होती है कि नहीं? क्या आने वाली पीढिय़ां यही पढ़ेंगी कि भारत को विश्वगुरु बनाने का सपना दिखाने वालों में इतना भी दम नहीं था कि गुंडई पर उतरे किसी देश के सामने सीधा खड़ा भी हो सकें? यकीनन समय की मांग है कि हम अमेरिका से रणनीतिक साझेदारी बनाए रखें और चीन से मुकाबले को समय आने पर उसका इस्तेमाल भी करें। मगर रूस जैसे परखे हुए दोस्त से संबंध बचाना क्या हमारी जरूरत नहीं? क्या ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने को हमें ईरान की जरूरत नहीं? सवाल यह नहीं कि भारत अमेरिका के करीब है या नहीं। सवाल यह है कि क्या भारत अपनी शर्तों पर करीब है ?
क्या यह कहना गलत है कि साझेदारी बराबरी की हो, तभी वह ताकत है वरना तो वही कमजोरी बन जाती है। यह बात आज जब आम भारतीयों को भी समझ आ रही है, तब यह बात 12 साल से सरकार चला रहे कथित तौर पर दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचाने वाले हमारे प्रधानमंत्री को क्यों समझ नहीं आ रही ? पता नहीं यह रहस्य कभी खुलेगा भी या नहीं ?