समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राज कुमार भाटी पत्रकारिता के शुरूआती दौर से मेरे मित्र हैं। उनकी विद्वता का मैं तब से कायल हूं जब साल 1990 में जन समावेश नाम से मैंने एक दैनिक समाचार पत्र निकाला और विमोचन का दिन आ गया मगर अखबार पूरा तैयार ही नहीं हो पाया था। ऐसे में इत्तेफ़ाकन राजकुमार जी ने मेरे कार्यालय आए हालात देखकर उन्होंने मुझसे कहा कि आप प्रोडक्शन का बाकी काम देखिए, एडिटोरियल पेज मैं तैयार कराता हूं। अखबार का पहला संपादकीय कितना महत्वपूर्ण होता है यह बात हर वह व्यक्ति भली भांति समझता है जो अखबारों से थोड़ा बहुत भी जुड़ा रहा हो। भाटी जी ने अखबार के लिए जो उम्दा संपादकीय उस दिन लिखा, वह मेरे दिलो दिमाग पर आज तक छपा हुआ है। पिछले कुछ वर्षों से उन्हें समाचार चैनलों पर होने वाली चर्चाओं में हिस्सा लेते समय प्रगतिशील और ज्ञानवर्धन बातें करता हुए जब देखता हूं तो सुखद अनुभूति होती है। मैं दावे से कह सकता हूं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शायद ही किसी अन्य पत्रकार ने शास्त्रों, साहित्य, समाज शास्त्र और तमाम अन्य विषयों पर इतना अध्ययन किया हो, जितना भाटी जी ने किया है। गांव देहात की पृष्ठभूमि से निकल कर हमारे बीच का एक व्यक्ति इस ऊंचाई तक पहुंचा कि आज टीवी पर बड़े बड़े धुरंधरों को धूल चटा देता है। इन्हीं भाटी जी के एक बयान को लेकर आजकल जो विवाद चहुंओर छाया हुआ है, उसे देख सुन कर दुख होता है। मैने लगभग बारह मिनट का उनका पूरा भाषण सुना और विभिन्न जातियों को लेकर समाज में प्रचलित लोकोक्तियों के उद्धरण के अतिरिक्त बाकी सारी बातें बहुत गहरी और सम सामयिक लगीं । जिन लोकोक्तियों का जिक्र उन्होंने किया उन्हें भी उन्होंने मन से नहीं बनाया और वे न जाने कब से समस्त उत्तर भारत में कही सुनी जा रही हैं। मगर फिर भी मैं कहना चाहूंगा कि उन्हें ऐसे मुहावरों और लोकोक्तियों को सार्वजनिक मंचों पर कहने से बचना चाहिए था । मेरा ऐसा कहने का एकमात्र कारण यह है कि ऐसी बातों की अनुगूंज सदैव नकारात्मक ही होती है और इससे जातीयता के खिलाफ प्रगतिशील समाज की लड़ाई कमजोर होती है। पूरा समाज जरूरी विषयों से हट कर इन पर चर्चा में उलझ जाता है और इसका लाभ उन्हीं शक्तियों को होता है, जिनसे लडऩे में भाटी जी जैसे लोग पूरी ताकत से लगे हुए हैं। वर्ष 1931 के बाद से भारत में पूरी जातिगत गणना नहीं हुई मगर एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में 4,600 से अधिक समुदायों का उल्लेख किया गया है। उपजातियों की भी गणना हो तो यह आंकड़ा कई गुना और बढऩे की उम्मीद है। इस साल हो रही जन गणना जातियों के आधार पर है और अगले साल तक तस्वीर साफ होने की उम्मीद की जा रही है। अजब स्थिति है कि यहां हर कोई अपनी जाति को लेकर दंभ अथवा हीन भावना पाले बैठा है और जब मौका मिले दूसरी जातियों का उपहास उड़ाने में गर्व महसूस करता है। जिसके जीवन में कोई निजी उपलब्धि नहीं वह जीवन में इत्तेफाक से मिली जाति को ही अपनी पहचान बनाए घूम रहा है। जाति को लेकर हीन भावना पाले बैठे लोगों की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। हममें से ऐसा कौन होगा जिसने अपनी जाति से जुड़ी नकारात्मक बातें कभी न सुनी हों। आप बेशक खुद को सवर्ण कहें अथवा पिछड़ा, अनुसूचित कहें अथवा कुछ और मगर जातीय उपहास से आप भी शायद बच नहीं पाए होंगे। हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते थे कि जातीय व्यवस्था ही कुछ ऐसी है कि नीची से नीची समझे जाने वाली जाति भी अपने से नीची जाति ढूंढ लेती है और उसका मखौल उड़ाती है। मगर अब जैसे जैसे शिक्षा, तकनीक, शहरीकरण और समृद्धि का फैलाव बढ़ा है, समाज इस कूप मंडूकता से धीरे धीरे ही सही मगर बाहर आ रहा है। तमाम जातियों के युवा अब प्रेम विवाह करते समय जाति की परवाह नहीं करते । नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार भारत में अंतर्जातीय विवाहों की संख्या अब ग्यारह फीसदी तक पहुंच गई है। महानगरों में ही नहीं बल्कि ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में भी अंतरजातीय विवाह अपेक्षाकृत बढ़े हैं। स्वयं भारत सरकार भी ऐसे विवाहों को प्रोत्साहित करने के लिए योजनाएँ चलाती रही है । याद कीजिए, पचास साठ साल पहले भी क्या यही स्थिति थी ? क्या तब भी दूसरी जातियों के लोगों के साथ हम इतने ही सहज थे, जितने आज हैं ? ऐसे में क्या कोई दावे से कह सकता है कि भारत में जाति प्रथा स्थाई तौर पर प्रभावी रहने जा रही है ? हो सकता है कि हमारे जीते जी यह व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त न हो मगर अगले सौ दो सौ सालों की क्या कोई गारंटी ले सकता है ? इस ज़हालत से बाहर आए बिना भारत तरक्की कर भी सकता है क्या ? कुछ जमा बात यह है कि जातीय वैमनस्य का दौर लगभग बीत चुका है और जहां थोड़ा बहुत है, वह भी आखरी सांसें गिन रहा है तो फिर क्यों उस काले अध्याय को याद करना ?
से उपजे दंभ अथवा हीन भावना को रात गई बात गई कि तर्ज पर भुलाया नहीं जाना चाहिए ?