अख़बार में ख़बर पढ़ी कि प्रदेश के अनेक शहरों में बंदरों के बढ़ते आतंक के चलते वन विभाग ने अन्य उपायों के साथ साथ अब उन्हें मारने की भी योजना बनाई है। हालांकि भारत में बंदरों को मारना प्रतिबंधित है क्योंकि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत बंदर एक संरक्षित जीव है। मगर अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्देश पर प्रदेश में बनी एक योजना में बंदरों को वनों में छोडऩे, उन्हें डरा कर भगाने तथा उनकी नसबंदी करने के साथ साथ उन्हें मारना भी उपाय के रूप में शामिल किया गया है। बेशक मैं भी इन बंदरों से बेहद त्रस्त हूं और अपने घर पर आए दिन उनके द्वारा किए गए उत्पात को झेलता हूं। यही नहीं उनके भय से अब वृंदावन भी नहीं जाता, जहां जाना मुझे बेहद भाता है मगर फिर भी बंदरों को मारने की बात मुझे अच्छी नहीं लग रही। विचारणीय है कि क्या बंदरों की समस्या एक दिन में पैदा हुई है और क्या उनकी हत्या के अतिरिक्त हमारे पास अन्य विकल्प बेहद सीमित हैं? हिमाचल प्रदेश ने भी बंदरों को मारने के आदेश दिए थे, वहां तो आतंकी बंदर को मारने पर पांच सौ रुपए का इनाम भी था मगर क्या वहां हालात सुधर गए? बेशक बंदरों का आतंक पूरे देश में है और सर्वोच्च्य न्यायालय, राष्ट्रपति भवन और संसद तक इनके आतंक के साए में हैं मगर फिर भी क्या थोड़ा ठहर कर इस योजना पर पुनर्विचार नहीं किया जाना चाहिए?
एक अनुमानित आंकड़े के अनुसार देश में लगभग पांच करोड़ से अधिक बंदर हैं और उनमें से तकरीबन चालीस फीसदी भारतीय शहरों और गांवों में स्थाई रूप से रहते हैं। यह भी एक आंकड़ा है कि देश में सालाना दस लाख से अधिक लोगों को बंदरों द्वारा काटा जाता है मगर कमाल है कि फिर भी कभी कोई तूफान नहीं उठा। अब जब राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू पिछले महीने वृंदावन और गोवर्धन गईं तब जाकर यह मुद्दा गरमाया। राष्ट्रपति को बंदरों की झपटमारी से बचाने के लिए सैकड़ों सुरक्षाकर्मियों को जब तैनात करना पड़ गया तो यह बड़ी खबर बन गई। वह मीडिया जगत जिसने इससे पहले कभी भारत के शहरों में बढ़ते इस ‘आतंक’ को कभी तवज्जो नहीं दी, उसकी भी जैसे नींद खुल गई और अब हर कोई कह रहा है कि बंदर एक राष्ट्रीय चुनौती हैं। यकीनन दिल्ली से लेकर शिमला, वृंदावन और हरिद्वार तक, बंदरों की बढ़ती संख्या और उनका आक्रामक व्यवहार आम नागरिकों, पर्यटकों और संस्थानों के लिए चिंता का कारण है मगर यह समस्या अचानक उत्पन्न नहीं हुई है। इसके पीछे दशकों से चल रही मानवीय गतिविधियों और नीतिगत कमी का ही योगदान है। भारत में पाए जाने वाले प्रमुख बंदर रिसस मकाक और हनुमान लंगूर मूलत: वन्य जीव हैं, जिनका प्राकृतिक आवास जंगल और पहाड़ी क्षेत्र रहे हैं। लेकिन तेजी से हो रहे शहरीकरण, वनों की कटाई और मानव विस्तार ने उनके पारंपरिक आवास को सीमित कर दिया है। परिणामस्वरूप, ये जीव भोजन और सुरक्षा की तलाश में शहरों की ओर आ गए। शहरों ने भी उन्हें निराश नहीं किया। खुले कूड़े के ढेर, बाजारों और घरों से निकलने वाला खाद्य अपशिष्ट और सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक आस्था के नाम पर नियमित रूप से खिलाया जाने वाला भोजन इन सबने बंदरों के लिए शहरों को एक ‘आसान जीवन’ का केंद्र बना दिया है। धीरे-धीरे यही निर्भरता आदत में बदल गई और फिर इसी आदत ने आक्रामकता को जन्म दे दिया। और अब स्थिति यह है कि बंदर न केवल भोजन छीनते हैं, बल्कि काटने और हमला करने के अतिरिक्त चश्मा और पर्स तक छीन लेते हैं । धार्मिक स्थलों पर यह समस्या विशेष रूप से गंभीर है। वहां बाकायदा ऐसे दुकानदारों के गिरोह हैं जो अपने एजेंट बंदरों से पहले झपटमारी करवाते हैं और फिर खुद ही अपने आदमियों के जरिए अपनी दुकान से खाने पीने का सामान बंदरों को दिलवाकर सामान वापिस करवा देते हैं। उधर, मंदिरों और तीर्थस्थलों पर लोग बाग स्वयं भी बंदरों को प्रसाद और फल खिलाना पुण्य का कार्य मानते हैं। यही परंपरा अनजाने में समस्या को और गहरा करती है। बंदर यहां मनुष्यों से डरना छोड़ देते हैं और उन्हें भोजन के स्रोत के रूप में देखने लगते हैं। परिणामस्वरूप, वे अधिक साहसी और आक्रामक हो जाते हैं। यह तो स्पष्ट है कि केवल ‘भगाने’ या ‘पकडक़र दूर छोडऩे’ से समस्या का स्थायी हल नहीं निकलेगा। इसके लिए बहुआयामी और संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है और ऐसे में निदान समस्या के कारणों में ही तो छुपा है। हमें देर सवेर समझना ही होगा कि बंदरों का यह ‘आतंक’ वास्तव में मानव और प्रकृति के बीच बिगड़े संतुलन का ही परिणाम है। यदि हम इस संतुलन को समझदारी और संवेदनशीलता के साथ पुन: स्थापित कर सकें, तो न केवल शहर सुरक्षित बनेंगे, बल्कि वन्य जीवों के साथ सह-अस्तित्व का मार्ग भी प्रशस्त होगा। बंदरों को मार कर हम उनसे निजात पा लेंगे, ऐसा कम से कम मुझे तो नहीं लगता ।