२०२७ विधानसभा चुनाव
आज की राजनीति में इतना बदलाव आ गया है कि जो नेता पानी पी-पीकर किसी दल को बुरा-भला कहते हैं पल भर में फिर उसका दामन भी थाम लेते हैं इसलिए अब कोई किसी के साथ स्थाई रहेगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। राजनीति में कहीं कोई समर्पण नहीं बचा है। जहां जिसका फायदा है वहीं वो उसके साथ चला जाता है। जनता क्या कहेगी, मतदाता क्या कहेंगे, अब ये कोई नहीं सोचता। पहले के जमाने में अगर कोई बड़ा नेता किसी के साथ चला जाता था तो फिर बड़ी लंबी चर्चा होती थी। आज तो खुद जिस दल में कोई बड़ा नेता शामिल होता है वो अपने समर्थकों से कहता है कि जहां फायदा मिलेगा वहां चले जाएंगे। इसीलिए अब समर्पित नेताओं की कमी हो गई है। दो दशकों से ये खेल चल रहा है। चुनाव के समय में तो आया राम गया राम बहुत चलता है। दो दशकों का इतिहास सबके सामने है। राजनीतिक फायदे के लिए कट्टर दुश्मन भी एक हो गये थे और समय निकला, फायदा उठाया और फिर अलग-अलग हो गये। अब राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं रहा है। चर्चा चल रही है कि जिन लोगों ने अपने निजी स्वार्थ के कारण समाजवादी पार्टी से नाता तोड़ा था और एनडीए का दामन था अब फिर एक बार घर वापसी की चर्चा चल रही है। कुछ ऐसे दल भी थे जो २०२२ में सपा में आ गये थे और इसी भगदड़ के चक्कर में भाजपा ने २०१७ में जिनको विधायकी का टिकट दिया था उनको फिर रिपीट कर दिया था। अब भी तस्वीर कुछ ऐसी ही बनती दिखाई दे रही है। सूत्र बताते हैं कि समाजवादी पार्टी में शामिल होने के लिए एनडीए के कुछ दल फिर सम्पर्क में हैं। अब देखना होगा कि क्या समाजवादी पार्टी ऐसे लोगों पर फिर भरोसा करेगी और २०२७ में साथ लेकर फिर चुनाव मैदान में उतरेगी या ऐसे लोगों को अब मौका नहीं मिलेगा फिलहाल चर्चा यही है कि सपा कुछ इन दलों के प्रति नरम हुई है। क्योंकि सपा के लिए भी २०२७ जीतना बहुत ही जरूरी है वरना फिर कार्यकर्ताओं का जोश समाप्त हो जाएगा और जिस तरह आज बसपा सत्ता से दूर है, कार्यकर्ताओं का पता नहीं है, ये निराशा भी सपा में दिखाई दे सकती है। फिलहाल जो माहौल चल रहा है वो काफी हद तक बदला हुआ है इसलिए सपा भी अगर पुराने लोग वापस आएंगे तो उनको लेकर अपना रूख और नरम कर सकती है। जय हिंद