इजरायल-ईरान युद्घ का असर वैश्विक रहा। अनेक देशों में पेट्रोल, डीजल के भंडार खत्म होने लगे। रसोई गैस का संकट खड़ा हो गया। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। भारत के हर राज्य के हर शहर में हर गैस एजेंसी पर लाइने दिखने लगीं। ऑनलाइन बुकिंग भी नहीं हो रही थी। ऊपर से प्रति सिलेंडर साठ रुपए भी बढ़ा दिए गए। जनता परेशान थी, राजनीतिक दल स्वाभाविक रूप से शुद्घ राजनीति करने पर आ गए। विपक्ष सत्ता पर आरोप लगा रहा था तो सत्ता पक्ष अंतर्राष्टï्रीय समस्या की दुहाई दे रहा था। यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि सरकार बता रही है कि रसोई गैस की कहीं कोई कमी नहीं है, तो बुकिंग क्यों नहीं हो पा रही है। एक बात और है कि अब समस्या कोई हो, लोग उसका उल्लेख और समाधान सोशल प्लेटफार्म पर तत्काल तलाशने लग जाते हैं। रसोई गैस को लेकर संघर्ष शुरू हुआ तो जनता ने सोशल प्लेटफार्म पर जिस नेता को सबसे ज्यादा किया वह स्मति ईरानी रही। किसी ने लापता लेडीज कह कर दिया किया, किसी ने मिसिंग बताया। लोग कह रहे थे कि गैस सिलेंडर की समस्या का सबसे ज्यादा दर्द कोई समझता था तो वह स्मति ईरानी ही थीं। जनता गलत भी नहीं थी। पूरा देश देखता था कि अगर सिलेंडर पर दस रुपए भी बढ जाया करते थे तो स्मृति ईरानी से जनता का महंगाई का यह बोझ देखा नहीं जाता था। वह रसोई गैस के दाम बढने के विरोध में तत्काल सडक़ पर आ जाती थीं। भारत की जनता ने स्मृति ईरानी को न जाने कितनी बार सिलेंडर लेकर सडक़ पर संघर्ष करते देखा था। मगर इस बार लोग हैरान थे, रसोई गैस के दाम भी बढ़ गए, गैस मिल भी नहीं रही थी और कालाबाजरी भी होने लगी थी, मगर जनता के दुख दर्द को समझने वाली स्मृति कहीं नहीं दिख रहीं थीं। अगर यह कहा जाए कि संकट के इस समय में दिक्कत से घिरे आम आदमी ने भगवान के बाद किसी को याद किया तो वह स्मृति ईरानी ही थी तो गलत न होगा। इससे पता चलता है कि जनता स्मृति ईरानी को कितना चाहती है। मगर जनता को मायूसी हाथ लगी क्योंकि जिससे उन्हें उम्मीद थी वह कहीं दिखी ही नहीं।