प्रसिद्घ गीतकार इंदीवर ने एक गीत लिखा होठों से छू लो तुम, वाकई बहुत शानदार गीत है, प्रसिद्घ गायक जगजीत सिंह की आवाज ने इस गीत को जन जन तक पहुंचा दिया था। इसकी एक लाइन है कि- ना उम्र की सीमा होना जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन। मगर भाजपा ने इस लाइन के अर्थ को ही बदलकर रख दिया है। भाजपा में उम्र की सीमा है। ११ मार्च के युग करवट के अंक के इसी कॉलम में मैंने ५0 साल से ऊपर के लोग क्या करेंगे भाजपा में शीर्षक से लेख लिखा था। मैंने लिखा था कि भाजपा में ५0 साल से अधिक उम्र वाले लोगों को अब संगठन में पद नहीं देने की नीति बन रही है। मेरे इस लेख पर अनेक लोगों की प्रतिक्रियाएं आईं। कुछ ने लिखा पेंशन लेंगे, कुछ ने लिखा रिटायरमेंट विद पेंशन। एक पाठक की प्रतिक्रिया थी कि यदि ५0 साल से अधिक उम्र के व्यक्ति को संगठन में पद नहीं मिलेगा तो फिर भाजपा को प्रत्याशी चयन में भी यही नियम लागू कर देना चाहिए। किसी भी चुनाव में टिकट भी ५0 साल से कम उम्र वालों को ही दें। सबसे दिलचस्प प्रतिक्रिया तो यह थी कि भाजपा नियम बना ले कि ५0 साल से अधिक उम्र का कोई व्यक्ति, महिला उसे वोट ही ना दे। भाजपा में इन दिनों अलग ही रीत चल निकली है। हालांकि इसे नई रीत कहना भी गलत ही होगा, क्योंकि भारत का इतिहास है कि जब-जब किसी दल ने लंबे समय तक सत्ता सुख भोगा है तब-तब उसने आत्मघाती कदम उठाए ही हैं। कांग्रेस का हाल सबके सामने जीवंत है। भाजपा ओबीसी प्रेम में इतनी डूबी कि अपने परंपरागत सवर्ण वोट को दूर कर दिया। यूजीसी कानून ना लाकर हिन्दुत्व एकता की बात करके दलित, पिछड़े, अगड़े, अमीर, गरीब सभी को एक साथ रखा जा सकता था मगर भाजपा के योजनाकार ऐसा नहीं कर सके। ब्राह्मïण विधायक, ठाकुर विधायक अलग-अलग बैठक करके जातिगत विभाजन के दर्शन करा ही चुके। अब ५0 साल का नियम लाकर इस उम्र के कार्यकर्ता नाराज कर लिए। कार्यकर्ता की नाराजगी मतलब उसका घर बैठ जाना, कार्यकर्ता का घर बैठ जाना मतलब वोटों पर असर और वोटों के असर का मतलब सत्ता से बेदखली। सोचो और विचारो।