विधानसभा चुनाव २०२७
उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होना है। अगर ये कहा जाए कि मात्र सात माह चुनाव में बचे हैं तो गलत नहीं होगा। मात्र सात माह बचे होने के बाद भी अभी तक उत्तर प्रदेश में मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं हो पाया है और ना ही पार्षद मनोनीत हुए हैं और अन्य पदों पर भी कोई नियुक्तियां नहीं हुई हैं। अब इंतजार भी बहुत लंबा हो गया है। अगर मान भी लिया जाए कि कुछ दिनों बाद मंत्रिमंडल का विस्तार होगा तो मात्र छह महीने के लिए मंत्री बनने का क्या लाभ होगा। क्योंकि अगले वर्ष के शुरू में ही आचार संहिता लग जाएगी और सबकुछ चुनाव आयोग के हवाले हो जाएगा। दरअसल भाजपा कार्यकर्ता एक पेड कार्यकर्ता की तरह कार्य करता है। पूरे समर्पण से करता है, लेकिन जब देने का नाम आता है तो उसे केवल और केवल आश्वासन ही मिलता है। अब नई भाजपा में तो जो पुराने दलों से लोग आए हैं वो चांदी काट रहे हैं। इस समय यूपी में भाजपा में ६२ विधायक वो हैंं जो बसपा ये आए हैं। सात मंत्री वो हैं जो बसपा से आए हैं। एक डिप्टी सीएम वो हैं जो बसपा से आए हैं। पूरा समय दूसरे दलों में मौज काटी और अब भाजपा में मौज काट रहे हैं, लेकिन जो लंबे समय से भाजपा का झंडा बुलंद किये हुए थे वो आज भी इंतजार में ही हैं। तीसरी आंख ने देखा कि लगातार कार्यकर्ता धूप-छांव, सर्दी-गर्मी, बरसात हो, हमेशा पार्टी का झंडा बुलंद किये रहता है, लेकिन उसे वो नहीं मिल रहा है जिसका वो हकदार है। मंत्रिमंडल के विस्तार की बात हो, संगठन में जिम्मेदारी की बात हो तो लॉलीपॉप ही मिलता है। बहरहाल, कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज करना हर दल के लिए अच्छा संकेत नहीं है। लंबे समय बाद भाजपा सत्ता में आई ैहै। नौ वर्ष यूपी में भी सत्ता में हो गये, लेकिन अभी तक कार्यकर्ताओंं को जो सम्मान मिलना चाहिए था वो नहीं मिला। २०१७ में जिन लोगों को राज्यमंत्री का दर्जा मिला था, २०२२ में किसी को दोबारा दर्जा नहीं मिला। आठ हजार से ज्यादा पद पार्षद और सभासदों के खाली हैं। अन्य पद भी खाली हैं। इसीलिए अगर अभी भी समय रहते कार्यकर्ताओं को कुछ नहीं मिला तो फिर २०२७ में कार्यकर्ता इतने जोश के साथ नहीं लगेंगे इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। जय हिन्द