विधानसभा चुनाव २०२७
योगी सरकार में पिछले नौ साल में कई दर्जन अपराधी पुलिस मुठभेड़ में मारे गये। २०१७ से लेकर २०२६ तक पुलिस ने जिन अपराधियों को मौत के घाट उतारा उसमें अब धर्म और जाति के आधार पर सियासत शुरू हो गई है। २०२७ के विधानसभा चुनाव में पुलिस के एनकाउंटर चुनावी मुद्दा जरूर बनेंगे। विपक्ष दबी जुबान से समुदाय विशेष एवं जाति विशेष के साथ एनकाउंटर पर भी जरूर सरकार को घेरने की तैयारी में है। विपक्ष के साथ एनडीए गठबंधन यानि सुहेलदेव पार्टी और निषाद पार्टी के प्रमुख भी गाजीपुर में हुए एनकाउंटर पर सवाल उठा रहे हैं और जांच की मांग कर रहे हैं। दरअसल, इन एनकाउंटर में समुदाय विशेष और जाति विशेष के एनकाउंटर की संख्या ज्यादा बतायी जा रही है। बड़ी हैरत की बात है कि विपक्ष एनकाउंटर पर जाति और धर्म के आधार पर बात कर रहा है जबकि कोई अपराधिक घटना होती है तो उसमें किसी विशेष समुदाय का कोई व्यक्ति लिप्त होता है तो यही कहा जाता है कि अपराधी की कोई जाति नहीं कोई धर्म नहीं होता। लेकिन जब चुनावी मौसम हो, वोटों की बात हो तो फिर विपक्ष हर कार्रवाई को राजनीतिक चश्मे से देखता है। हालंाकि कहीं ना कहीं सत्ता पक्ष भी एनकाउंटर को लेकर चुनावी लाभ भी देख रहा है। कुछ भी हो अपराधी अपराधी होता है और उसे जाति धर्म के आधार पर उसका आंकलन नहीं करना चाहिए। लेकिन अफसोस इस बात का है कि हमारे देश में हमेशा लाशों पर राजनीति होती रही है। कभी-भी चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष हो वो जनहित के मुद्दे पर राजनीति नहीं करता। जाति और धर्म के आधार पर अब राजनीति होने लगी है। ये लोकतंत्र के लिए अच्छा संदेश नहीं है। योगी सरकार के नौ साल और मोदी सरकार के 12 साल में जिस तरह की उपलब्धियां हुई है उसके सहारे भी चुनाव जीता जा सकता है। धर्म और जाति से ऊपर उठकर भी विकास के मुद्दों पर चुनाव लड़ा जा सकता है। उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था जितनी सुधरी है और मजबूत हुई इस पर भी चुनाव जीता जा सकता है। इसमें कोई दोराय नहीं कि योगी सरकार जब से प्रदेश में बनी है कानून व्यवस्था से कोई भी समझौता नहीं किया जा रहा है। अगर इन्हीं उपलब्धियों पर चुनावी मैदान में उतारा जाए तब भी कामयाबी मिल सकती है। जाति-धर्म से ऊपर उठकर अगर राजनीति हो फिर लोगों के बीच दूरियां बढ़ रही है उसमें काफी कमी आयी है। सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास एक ऐसा नारा है जो वास्तव में कहीं ना कहीं जमीनी तौर पर सही बैठ रहा है। राजनीति के चश्मे ने इस नारे को कमजोर कर दिया। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाला 2027 का चुनाव विकास और सरकार की उपलब्धियों केे सहारे ही लड़ा जाएगा और अगर ऐसा हो तो फिर विपक्ष भी जाति और धर्म की राजनीति नहीं कर पायेगा। जय हिंद