गाजियाबाद की राजनीति
गाजियाबाद में तैनात अफसर सीधे तौर पर लखनऊ से जुड़े होते हैं। गाजियाबाद और नोएडा का इतिहास रहा है कि यहां पर तैनात होने वाला अफसर पहले पंचम तल जो अब लोकभवन कहलाता है सीधा वहीं से आता है। गाजियाबाद भले ही नोएडा और हापुड़ कटने के बाद छोटा जिला हो गया हो लेकिन स्टेट्स और कद में ये आज भी बड़ा है। उद्योग नगरी के बारे में बात करें तो कानपुर के बाद गाजियाबाद का ही नाम था। राजस्व देने में भी उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद की अहम भूमिका रहती है। राजनीतिक तौर पर भी गाजियाबाद अपने आप में हमेशा से मजबूत रहा है। इस बार भाजपा सरकार में एक नहीं दो-दो मंत्री गाजियाबाद का प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे पहले भी चाहे केंद्र की सरकार हो या २०१७ में यूपी में योगी की सरकार में गाजियाबाद का प्रतिनिधित्व रहा है। सियासी तौर पर मजबूत होने के बाद भी यहां पर नेताओं में बहुत गुटबाजी है। जाहिर है कि अफसर सब नेताओं को खुश नहीं कर सकते। यहां के चाहे वर्तमान जनप्रतिनिधि हो या फिर पूर्व जनप्रतिनिधि हो सीधे सरकार के मुखिया तक पकड़ रखते हैं यही कारण है कि यहां के अफसर जनप्रतिनिधियों से ज्यादा पूर्व जनप्रतिनिधियों की सुनवाई इसलिए करते हैं कि वो पुराने जमाने के नेता रहे हैं और सीधा उनका ऊपर से सम्पर्क है। गाजियाबाद के एक पूर्व जनप्रतिनिधि इस समय बहुत ही छाये हुए हैं। वो माह में महाराज जी से कई मुलाकातें करते हैं और महाराज जी उन्हें पूरा सम्मान देते हैं यहीं कारण है कि कई ऐसे मामले अभी प्रकाश में आये जिनको पूर्व जनप्रतिनिधि ने बड़ी गंभीरता से उठाया तो उस पर कार्रवाई भी हुई। जबकि वर्तमान जनप्रतिनिधियों का भी कहीं ना कहीं पर्दे के पीछे से सपोर्ट उन चीजों में रहा है जिनको पूर्व जनप्रतिनिधि ने प्रमुखता से उठाकर कार्रवाई कराई है। बहरहाल, कुछ अफसर नेताओं की आपसी गुटबाजी से खुश भी है और कुछ चक्की के पाटों की तरह पिस भी रहे हैं। ईमानदार अफसरों के लिए कभी-कभी ज्यादा दबाव उनको परेशान भी कर देता है क्योंकि नियम से चलने वाला अधिकारी कम दबाव मानते हैं।
जय हिंद