नोएडा में हुए हिंसक श्रमिक आंदोलन को बड़ी गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि श्रमिक आंदोलन की आड़ में कहीं अराजकता और अस्थिरता पैदा करने की साजिश तो नहीं है। यह सही है कि नोएडा में श्रमिकों का आंदोलन कई दिन से जारी था। मगर प्रशासन लगातार संवाद कर रहा था। रविवार को भी खुद नोएडा डीएम ने वार्ता कर अपील जारी की। श्रमिकों को उनके अधिकार दिलाने की घोषणा भी की। कंपनी प्रबंधन भी वार्ता में शामिल हुआ, उन्होंने भी अपनी तरफ से सभी आश्वासन दिए। उसके बावजूद सोमवार को दिन निकलते ही इतनी बड़ी संख्या में लोगों का एकत्र होना और हिंसक हो जाना, यह लोकल इंटेलिजंस की भारी चूक है। हंगामे और बवाल का इनपुट मिलने के बाद भी भीड़ को मौका क्यों दिया गया। क्या कमिश्नरेट के अधिकारी आंदोलन की आग की तपिश को महसूस नहीं कर पाए। वेतन संबंधी विसंगती समझ में आती हैं, मगर हिंसा का ये रूप समझ से परे है। यह सी है कि आज के समय में 10-15 हजार में कुछ नहीं होता। मगर इसका यह तो मतलब नहीं है कि आगजनी की जाए। इस आंदोलन का कोई नेता नहीं है, किसी का नेतृत्व नहीं है। फिर किसके इशारे में सबकुछ हुआ। नोएडा देश का एक बड़ा इंडस्ट्री हब है। यहां हुई कोई भी घटना वैश्विक स्तर पर चर्चा में जाती है। कहीं इसीलिए तो नोएडा को नहीं चुना गया। नोएडा की प्रत्येक कंपनी में पिछले चार महीने में नौकरी पर रखे गए हर श्रमिक की जांच होनी चाहिए। यह लोग कहां से आए हैं, इनकी पृष्ठभूमि क्या है? इनके बीते जीवन में किस-किस संस्था ये जुड़े रहे हैं। सोमवार को आग बनकर सडक़ पर दिखाई दी। सरकारी ही नहीं प्राइवेट प्रॉपर्टी को भी निशाना बनाया गया। इस तरह की घटनाओं को कौन लोग अंजाम देते हैं? भारत को अस्थिर करने के कई षड्यंत्र सामने आ चुके हैं। दिल्ली-एनसीआर में कितने मॉड्यूलों का ख्ुालासा हो चुका है। ऐसे में नोएडा घटना को साधारण श्रमिक आंदोलन समझना उचित नहीं होगा। शासन को उच्च स्तर पर इस पूरे घटनाक्रम की जांच करनी चाहिए। ताकि अगर कहीं कोई साजिश है तो उसे यहीं रोका जा सके।