लोकसभा में नारी वंदन संशोधन अधिनियम रखने से पहले ही भाजपा और केन्द्र सरकार समझ गई थी कि इसे पास कराना लगभग असंभव है। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री ने कह भी दिया था कि नारी वंदन अधिनियम अगर पास नहीं हुआ तो उसका लाभ उन्हें मिलेगा और अगर पास हुआ तो किसी को कोई लाभ नहीं होगा। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भाजपा और सरकार का शीर्ष नेतृत्व इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने की तैयारी कर चुका था। अब भाजपा अभियान चलाकर बताएगी कि किस तरह कांग्रेस, सपा, टीएमसी आदि विपक्षी दलों ने महिलाओं को उनके अधिकार से वंचित कर दिया। हालांकि यह भी सही है कि कांग्रेस और सपा ऐसा अभियान नहीं चला पाएंगे जिसमें वह जनता को बता पाएं कि उनका पक्ष क्या था। कैसे वह लोकसभा की वर्तमान संसद सदस्यों की संख्या पर महिलाओं के लिए आरक्षण मांग रहे और केन्द्र सरकार परिसीमन के आधार पर अड़ी थी। अब अगले चुनाव तक नारी वंदन अधिनियम सत्ता और विपक्ष के लिए एक मुद्दा तो बना ही रहेगा। चुनाव में जाने के लिए भाजपा को एक सशक्त चुनावी मुद्दे की जरूरत भी थी, जो उसे मिल चुका है। क्योंकि कोरे हिन्दुत्व से बात बन नहीं रही थी और राम मंदिर लोग दर्शन कर चुके या कर रहे हैं। मगर एक बात भाजपा के थिंक टैंक को समझ लेनी चाहिए कि नारी वंदन अधिनियम का मुद्दा पूरी तरह उसके पक्ष में नहीं हैं। महिलाएं चर्चा करने लगी है कि किस तरह से इस अधिनियम को एक राजनीतिक और चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी है। दूसरी बात भाजपा थिंक टैंक को यह समझ लेना चाहिए कि भारत की महिलाएं अब स्मृति ईरानी की ना बातों में आती हैं, ना उनके महिला समर्थक होने का अब कोई असर ही होता है। क्योंकि देश की महिलाओं ने रसोई गैस वृद्घि के विरोध में स्मृति ईरानी के नेतृत्व को स्वीकार किया था। अब ना तो गैस के दाम बढऩे पर ना, गैस की किल्लत पर, स्मृति देश की महिलाओं को दिखाई ही नहीं दी। महिलाओं ने सोशल प्लेटफार्म पर स्मृति को तलाशा भी बहुत था। इसीलिए आशंका जताई जा रही है कि कहीं भाजपा का यह दाव उलटा ना पड़ जाए।