यूपी विधानसभा चुनाव २०२७
विधानसभा चुनाव २०२७ सपा और भाजपा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। ये सभी जानते हैं कि दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर जाता है। देश के प्रधानमंत्री का फैसला उत्तर प्रदेश ने कई बार किया है। देश का सबसे बड़ा राज्य और सबसे अधिक लोकसभा सीटें होने के कारण उत्तर प्रदेश के लोग देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी का भी फैसला करते हैं। लोकसभा चुनाव २०२९ में होना है। उससे पहले यूपी में विधानसभा चुनाव होना है। लोकसभा चुनाव २०२४ में समाजवादी पार्टी और कांगे्रस ने मिलकर यूपी में भाजपा को करारा झटका दिया था। तीन सौ पार का नारा देने वाली भाजपा बहुमत भी नहीं ला पायी और बैसाखियों के सहारे सरकार बनानी पड़ी इसलिए २०२७ के विधानसभा चुनाव दोनों दलों के लिए करो या मरो की स्थिति है। दस साल से समाजवादी पार्टी सत्ता से दूर है और २०२७ में अगर सपा की सरकार नहीं बनी तो फिर उसकी स्थिति भी बसपा की तरह ही हो जाएगी। २०२२ के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी का माहौल बहुत जबरदस्त था और भाजपा में भगदड़ मची। ओमप्रकाश राजभर, दारा सिंह, स्वामी प्रसाद मौर्या और ना जाने कितने बड़े नाम जो भाजपा में थे वो सब सपा में शामिल हो गये और इसी भगदड़ का ये कारण रहा कि भाजपा ने 2022 में किसी एक विधायक का टिकट नहीं काटा और सभी को रिपीट कर दिया। इस बार भगदड़ कुछ अलग होगी और उसकी शुरूआत भी हो चुकी है। इस बार सपा के लोग भाजपा की ओर शामिल होंगे। और इसी भगदड़ के सहारे भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव में अपनी मजबूत स्थिति बनाएगी। हालांकि आज भी ऐसा नहीं है कि भाजपा की स्थिति मजबूत नहीं है। लेकिन अफसरों की तैनाती में जाति विशेष के लोगों का खास ख्याल रखा जा रहा है। पीडीए का दावा भले ही होता हो लेकिन तबादले की सूची में कहीं उसका असर दिखाई नहीं देता। सवा सौ से अधिक सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाने वाले ब्राह्मïण समाज की नाराजगी भी कहीं ना कहीं दिखाई दे रही है। इन्हीं सब चीजों को ध्यान में रखते हुए अब नये सिरे भाजपा अपनी तैयारी कर रही है। समाजवादी पार्टी भी ब्राह्मïणों को लेकर सम्मेलन कर रही है लेकिन जो भगदड़ और तोड़-फोड़ की राजनीति शुरू हुई है वो विधानसभा चुनाव में अहम भूमिका निभाएगी इससे इनकार नहीं किया जा सकता। जय हिंद