पर्दे के पीछे रहकर कौन करता है राजनीति?
गाजियाबाद (युग करवट)। प्रदेश में कई बार बहुजन समाज पार्टी की सरकार रही, मायावती मुख्यमंत्री रहीं लेकिन आज बहुजन समाज पार्टी की ऐसी स्थिति है कि किसी सदन में उनका एक भी सदस्य नहीं है। आहिस्ता-आहिस्ता वो हर चुनाव हारती रहीं।
समाजवादी पार्टी के अंदर भी कुछ ऐसी ही तस्वीर है यहां भी कोई खुलकर बात नहीं करता। इसमें कोई दोराय नहीं यूपी में सपा प्रमुख अखिलेश यादव जरूर अपनी बेदाग छवि के सहारे एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं लेकिन वो भी इतना खुलकर नहीं खेल रहे हैं जितना उन्हें खेलना चाहिए। राजनीतिक गलियारों में हो रही चर्चाओं पर भरोसा करें तो बहुजन समाज पार्टी को बसपा के कद्दावर नेता सतीश मिश्रा और समाजवादी पार्टी में संस्थापक सदस्य प्रो. रामगोपाल यादव खुलकर खेलने नहीं देते। दोनों नेता अपनी-अपनी पार्टियों को दिल्ली का खौफ दिखाते हैं। सूत्र बताते हैं कि रामगोपाल यादव के परिवार के सदस्य की फाइल खुली हुई है और दिल्ली वालों को जब भी अखिलेश की सक्रियता दिखाई देती है वो राम गोपाल यादव को फाइल दिखा देते हैं उसके बाद रामगोपाल यादव अखिलेश यादव की रफ्तार हल्की करा देते हैं। अगर रामगोपाल यादव की फाइल नहीं होती है और अखिलेश यादव खुलकर खेलते तो आज समाजवादी पार्टी और मजबूती के साथ यूपी में काम करती। लेकिन चाचा के कारण अखिलेश यादव की स्थिति भी मोर की तरह हो जाती है वहीं बहुजन समाज पार्टी की स्थिति भी कई सालों से ऐसी ही चल रही है। बसपा के राष्टï्रीय महासचिव सतीश मिश्रा भी मायावती को दिल्ली का खौफ दिखाकर उन्हें खामोश रखते हैं। यही कारण है कि सतीश मिश्रा का प्रॉटोकॉल आज भी बना हुआ है और उनको हाईफाई सिक्योरिटी मिली हुई है। आखिरकार उनको सिक्योरिटी किस आधार पर दी गई है इसके पीछे यही कारण है कि वो दिल्ली वालों के लिए काम करते हैं और बहनजी को ऐसा डराते हैं कि अगर वो ज्यादा बोली या सडक़ों पर निकली तो फिर फाइलें खुल जाएंगी और स्थिति ठीक नहीं रहेगी। यही कारण है कि मायावती चाहते हुए भी बेबाक होकर अपनी बात नहीं रखती। इसमें कोई दोराय नहीं है आज भी दलित समाज बहुजन समाज पार्टी के साथ खड़ा हुआ है और अगर मायावती खुलकर सडक़ पर आ जाए तो उनके साथ दलित समाज ही नहीं जुड़ेगा बल्कि मुस्लिम समाज को सपा का विकल्प मिल जाएगा। मुस्लिम समाज की समस्या ये है कि उसके सामने फिलहाल कोई विकल्प नहीं है इसीलिए वो कोई भी निर्णय नहीं ले पाता और सतीश मिश्रा और रामगोपाल यादव की वजह से भाजपा जो मैसेज देना चाहती है वो चला जाता है और फिर एक माहौल बिल्कुल बदल जाता है। इसीलिए घर के लोगों से ही पहले दोनों दलों के प्रमुखों को लडऩा होगा।