युवा प्रदर्शनकारियों से डर कर पूरी दिल्ली को बंधक बना लिए जाने को बेशक आप कुछ भी नाम दें मगर दुनिया भर में इसे डर की संज्ञा दी जा रही है। डर का ऐसा सरकारी रूप कम से कम दिल्ली ने तो कभी नहीं देखा था । पचास हजार से अधिक सुरक्षाकर्मी, जेबी संगठनों के गुंडे, हजारों बेरिकेडिंग, धरपकड़ को हजारों बसें, सात हजार लोगों की हिरासत , इंटरनेट बंद, मेट्रो बंद, कैंसिल ट्रेनें ही नहीं 23 हजार सुरक्षाकर्मियों की एयर लिफ्टिंग जैसा और बहुत कुछ । दुनिया ने देखा कि अपने इकबाल को कायम रखने के चक्कर में मोदी सरकार बारह साल में तमाम तिगड़में कर बनाया गया अपना भौकाल ही गंवा बैठी। साफ दिखा कि यह प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे से शुरू होकर मोदी शासन के तमाम झूठे वादों तक पहुंच गया। किसी को नहीं पता कि युवाओं का यह आक्रोश कब शांत होगा। होगा भी अथवा नहीं मगर यह सबको अवश्य दिख रहा है कि हर बार गोल पोस्ट बदलने में माहिर मोदी सरकार इस बार खुद अपने बुने जाल में फंस गई और उसने बैठे बिठाए सारा नजला ज्ञानेश कुमार से हटा कर अपने सिर ले लिया। कोड़ में खाज यह कि एक दशक से उसके सुर से सुर मिलाने वाला सर्वोच्च्य न्यायालय भी अब उसे सही गलत का पाठ पढ़ा रहा है।
कहते हैं कि वक्त सदा एक सा नहीं रहता । यह बात मोदी जी पर भी लागू होती है। उनका समय बीतने की भी मुनादी की जा रही है। भीतर बाहर हर जगह खिचड़ी पक रही है। बाहर वालों को थामने का अनुभव तो उनके पास है मगर भीतर की चुनौती कष्टकारी हो सकती है। त्रिकोण के तीसरे कोण देश में वे करोड़ों युवा हैं जो या तो बेरोजगार हैं अथवा योग्यता के अनुरूप उनके पास काम नहीं है। इन युवाओं के आक्रोश को एक लम्बी चुप्पी के बाद अब जाकर आवाज मिली है और उसे बेअसर करना किसी के लिए भी आसान नहीं होगा। साफ दिख रहा है कि ये युवा बार बार आयेंगे और हर मुद्दे पर आएंगे। सरकार भी कब तक दिल्ली को बंधक बना कर रख सकेगी। सरकार को इलाज तो बीमारी का ही करना पड़ेगा। इस बीमारी के कई सिर हैं और कई हाथ। किसी एक हाथ अथवा सिर के कटने से काम नहीं चलने वाला। कहने सुनने में रुचिकर नहीं है मगर एक बीमारी का इलाज तो जैसे वक्त ने खुद ही कर दिया है। यह बीमारी है खुद को मेन स्ट्रीम कहने वाला बंधुआ मीडिया। दशकों से मलाई खा रहे इन हैडलाइन मैनेजरों की कभी ऐसी भी दुर्गति होगी, किसी ने सोचा न था। वाकई यह देखना सुखद नहीं है मगर यही दरहकीकत है कि दस अक्टूबर को गोदी रिपोर्टरों को जगह जगह प्रदर्शनकारियों ने दौड़ा लिया। वैसे तो कोविड के बाद से ही मेन स्ट्रीम मीडिया अपना असर खो चुका था मगर अब हालत यह है कि असली सहाफी खुद को पत्रकार कहते हुए भी शर्माने लगे हैं। यूं भी अब सोशल मीडिया का जमाना है और इन बिकाऊ टीवी चैनल्स को कोई नहीं देखता। युवाओं के आंदोलन को इन टीवी चैनल्स ने तवज्जो न देकर समझा कि वे खबरों का रास्ता रोक लेंगे मगर सोशल मीडिया ने पल पल की खबर लोगों तक पहुंचा दी। लोगों को भी समझ आ गया कि अन्ना आंदोलन के दौरान चौबीसों घंटे जो पचासों ओबी वैन जंतर मंतर पर मौजूद रहती थीं, वे इस बार ढूंढे से भी कहीं क्यों नहीं दिख रही? जानकार कहने लगे हैं कि यदि कभी सही सही सर्वे हुआ तो पता चल जाएगा कि इन चैनलों को देखना अब कम पढ़ा लिखा आदमी भी अपनी बुद्धिमत्ता का अपमान समझता है। वैसे यह सरकार के लिए भी झटका साबित हुआ कि दस दस हजार रुपए की खातिर उसके लिए रील बनाने वाले इस बार न जाने कहां बिला गए और मुखालिफ विचार के रील वाले इतने मुखर हो गए। उधर , भाजपा का धर्मभीरू मतदाता अलग से नाराज हुआ कि काहे आंदोलनकारियों के बीच अपने आदमी भेज कर जय श्री राम के नारे लगवाए और अपने साथ राम के नामलेवाओं की दुर्गति करवाई । सरकार की हैरानी का सबब यह भी रहा कि वंदे मातरम् का नैरेटिव तक उल्टा पड़ गया और रास्ता रोके जाने पर आंदोलनकारी सुरक्षा कर्मियों के सामने जगह जगह वंदे मातरम् गाने लगे। बेशक सरकार ने जंतर मंतर पर परिंदे को भी पर नहीं मारने दिया मगर इसका क्या कि युवाओं ने पूरी दिल्ली को ही जंतर मंतर बना दिया। जहां पुलिस ने रोका वहीं धरना और प्रदर्शन। ऐसा लगा जैसे देश किसी नीम बेहोशी से जागा है। बेशक आप और हम इन युवाओं के साथ हों अथवा नहीं मगर उनकी मांग को कैसे गैरवाजिब ठहरा सकते हैं? सरकार का काम होता है कि वह लोगों के जीवन में आसानियां पैदा करे और साथ ही साथ उसे बेहतर बनाने का जतन भी करे मगर विगत बारह सालों में यहां तमाम वादों और घोषणाओं के बावजूद ऐसा नहीं हुआ और अब एसआईआर की धांधलियों से युवाओं के सब्र का घड़ा छलक गया। अब यह सरकार को तय करना है कि वह सब्र का घड़ा फूटते देखने को उतावली तो नहीं है?