बात ज्यादा पुरानी नहीं है। आईसीआईसीआई बैंक का क्रेडिट कार्ड अपनी पर्स में रखता था। एक बार मासिक बिल आया 2307 रुपए। मैने लमसम तेईस सौ रुपए तो जमा कर दिए मगर सात रुपए यह सोच कर छोड़ दिए कि अगले महीने के बिल के साथ भुगतान कर दूंगा। अगले महीने कुछ खर्च न करने के बावजूद बिल आया लगभग साढ़े छ: सौ। जिसमें शामिल था, पिछले सात रुपए न जमा करने का छह सौ रुपए जुर्माना और बाकी उस पर टैक्स आदि। मुझे हैरानी हुई मगर फिर सोचा कि शायद बैंक के कम्प्यूटर से कोई भूल हुई है। इत्तेफाक से अगले कई महीने तक क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल भी नहीं किया मगर बिल हर बार पिछले बिल के साथ साढ़े छ: सौ अतिरिक्त जुड़ कर आता रहा। मैने भी इसे तब तक गंभीरता से नहीं लिया जब तक कि वसूली के लिए बैंक से फोन आने शुरू नहीं हो गए। बहस मुबाहिसा में कई महीने बीत गए और बिल लगभग सात हजार रुपए हो गया। बैंक के कार्ड का बिल न भरने के कारण सिबिल रिपोर्ट जब लगातार नीचे जाने लगी तब मेरे हाथ पांव फूले और बैंक से मामला सेटल करने पर राजी हुआ। लगभग 38 सौ रुपए देकर जान छुटी मगर सिबिल ठीक होने में कई साल लग गए। इस मकडज़ाल में फंसने पर ही मुझे समझ आया कि क्यों भारत में हर साल तेरह हजार से अधिक किसान और मजदूर कर्जों से आत्महत्या कर लेते हैं। बैंकों के कर्ज तले दब कर कसमसाने वाले करोड़ों किसानों, निम्न मध्यम वर्ग के लोगों और छोटे दुकानदारों को लेकर मैं अब तक दु:खी ही होता रहा हूं मगर अब उन पर बाकायदा तरस खाने को जी चाह रहा है। जी टीवी के मालिक सुभाष चंद्रा का बाइस हजार करोड़ रुपए का कर्ज जब मात्र साढ़े छ: करोड़ रुपए में निपट जाए तो भला उन लोगों पर तरस क्यों न आए जिनका इस मुल्क में कोई वाली वारिस नहीं है। अजब तेरी कारीगरी रे सरकार।
हो सकता है कि सुभाष चंद्रा से जुड़ी और सौ रुपए के कर्ज के बदले में बैंकों को मात्र तीन पैसे मिलने की इस खबर से किसी को हैरानी हो मगर आज के भारत में क्या अब ऐसी खबरें किसी हैरानी का बायस रह भी गई हैं? अपने बारह साल के कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब केवल एक बार ही किसी व्यक्ति की किताब का विमोचन अपने घर के सभागार में करें और वह व्यक्ति बीस बाईस हजार करोड़ रुपए भी अपनी अंटी में न डाल पाए तो फिर बात ही क्या हुई। अब यह शोध का विषय हो सकता है कि सुभाष चंद्रा के जी टीवी की चौबीसों घंटे भक्तईनुमा चापलूसी के चलते उन्हें यह प्रसाद मिला अथवा प्रधानमंत्री द्वारा मंच पर उनकी शान में कसीदे पढऩे के कारण। खोज खबर निकालने वालों को शायद यह सवाल भी आकर्षित करे कि चंद्रा को इतना बड़ा कर्ज कब कब और किस किस के कहने पर मिला। जिज्ञासुओं के लिए भी यह सवाल हो सकता है कि जब कुछ समय पहले ही 1260 करोड़ का अपना बंगला बेचने वाले चंद्रा का यह तर्क कैसे स्वीकार कर लिया गया कि उसकी नेट वर्थ अब मात्र 38 करोड़ रुपए है। सवाल और भी कई हैं, जवाबों की परवाह किसे है। वैसे कोई कुछ भी कहे मगर मेरी नजर में सुभाष चंद्रा सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी निकले। उन्हें बैंकों के हजारों करोड़ डकारने के बावजूद विजय माल्या, नीरव मोदी और चौकसी जैसे अन्य व्यापारियों और उद्योगपतियों की तरह देश छोड़ कर भागना जो नहीं पड़ा। सरकारी आंकड़ा है कि ये लोग 54 हजार करोड़ रुपए लेकर भागे मगर सुभाष चंद्रा अकेले 22 हजार करोड़ हजम करने के बावजूद बड़े बड़े मंचों को आज भी सुशोभित कर रहे हैं। बेशक यह आंकड़ा भी अब किसी का ध्यान नहीं खींचता मगर फिर भी याद तो आता ही है कि मोदी सरकार ने विगत दस सालों में बारह लाख करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज राइट ऑफ कर दिया है । जाहिर है कि इनमें किसान, मजदूर, कुटीर उद्योग और छोटे दुकानदार व व्यापारी नहीं वरन् सभी लोग धन्ना सेठ थे । वैसे इस सूची में अनिल अंबानी और गौतम अडानी जैसों उन लोगों का लाखों करोड़ रुपए का कर्ज भी शामिल नहीं हैं, जिनसे पर्दा हटना अभी बाकी है। घूम फिर कर सवाल वही है कि उन कमजोर लोगों पर तरस क्यों न खाया जाए जिनकी एक किश्त लेट हो जाए तो रिकवरी वाले घर पहुंच जाते हैं। आम आदमी यदि कर्ज की मात्र एक फीसदी रकम न दे पाए तो बैंक उसकी संपत्ति कुर्क कर लेता है। किसान का टैक्टर बैंक उठा लाता है औ खेत तक पहुंच जाता है। आम आदमी कभी समझ ही नहीं पाता कि बैंकों के झोले में ‘सेटलमेंट’ जैसी एक चिडिय़ा भी होती है जो गरीब की झोपड़ी पर बैठने से शर्माती है। वह कभी समझ ही नहीं पाता कि फलां है तो मुमकिन है जैसे नारे उसके लिए नहीं बल्कि सुभाष चंद्रा जैसों के लिए हैं और नए भारत का यह बैंकिंग मॉडल उनके लिए नहीं वरन् सुभाष चंद्रा जैसों के लिए ही है।