गौर से देखिए, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा केवल एक मंत्री का पद छोडऩा भर नहीं है। वरन् यह उस राजनीतिक अहंकार की पहली दरार है जिसने लंबे समय से यह मान लिया था कि बहुमत का अर्थ जनमत पर स्थायी कब्ज़ा है। जंतर मंतर पर चले छात्र आंदोलन ने मेरी उम्र के लोगों का यह भ्रम भी टूटा है कि आज की युवा पीढ़ी केवल सोशल मीडिया पर गुस्सा निकालती है। मगर हमारे युवाओं ने साबित कर दिया कि जब भविष्य पर चोट पड़ेगी तो वे सडक़ों पर उतरने का साहस भी रखते हैं। छात्र छात्राओं के इस आंदोलन का सबसे बड़ा सबक यही है कि लोकतंत्र में सत्ता की सबसे बड़ी ताकत स्वयं जनता होती है और जनता की सबसे बड़ी ताकत उसका युवा वर्ग। जिस आंदोलन को शुरुआत में नजऱअंदाज़ किया गया, जिस पर तरह-तरह के आरोप लगाए गए, जिसे राजनीतिक साजिश कहकर बदनाम करने की कोशिश हुई, वही आंदोलन अंतत: सत्ता के सबसे मजबूत किलों में सेंध लगाने में सफल रहा।
अब सबसे बड़ा सवाल है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद क्या होगा? क्या केवल चेहरा बदल देने से व्यवस्था बदल जाएगी? क्या जिन नीतियों ने लाखों छात्रों को सडक़ों पर उतरने के लिए मजबूर किया, उनका पुनर्मूल्यांकन होगा? यदि सरकार यह मानती है कि एक मंत्री की विदाई से जनता का आक्रोश शांत हो जाएगा, तो वह सबसे बड़ी भूल करेगी। इतिहास गवाह है कि जब जनता व्यवस्था पर सवाल उठाने लगती है, तब केवल बलि का बकरा बदलने से संकट समाप्त नहीं होता। इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति को भी गहरे स्तर पर झकझोर दिया है। लंबे समय बाद युवाओं ने यह संदेश दिया है कि उनकी प्राथमिकता जाति, धर्म और भावनात्मक नारों से अधिक रोजगार, शिक्षा, पारदर्शिता और अवसर हैं। यदि हमारे राजनीतिक दल इस संकेत को पढऩे में असफल रहे, तो आने वाले वर्षों में उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। यह याद रखा जाना चाहिए कि अपने भविष्य से निराश युवा सारे राजनीतिक समीकरण पलटने की ताकत भी रखता है।
उधर, इस पूरे घटनाक्रम में यदि किसी की सबसे अधिक फजीहत हुई है तो वह है मुख्यधारा का मीडिया। एक अरसे से लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाले अधिकांश बड़े चैनल और अखबार जनता की आंख बनने के बजाय सत्ता के प्रवक्ता बने घूम रहे हैं। इस बार भी उन्होंने छात्रों के आंदोलन को बदनाम करने, छात्रों के इरादों पर सवाल उठाने और वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने की तमाम कोशिशें कीं मगर खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। वे भूल गए कि नई पीढ़ी जो फोन हाथ में लेकर पैदा हुई है। वह अखबार नहीं पढ़ती और समाचार चैनल्स की मुर्गा भिड़ंत में भी उसकी कोई रुचि नहीं है । वह तो बस सोशल मीडिया पर प्रत्यक्ष वीडियो देखती है। इसमें इस पीढ़ी का दोष ढूंढने से पहले मीडिया को अपने गिरेबान में झांकना पड़ेगा। खुद से पूछना पड़ेगा कि उसने युवाओं का भरोसा क्यों खोया? मीडिया संस्थानों के लिए सबसे बड़ी पूंजी दर्शक अथवा पाठक का विश्वास होता है। जब वही खत्म होने लगेगा तो सुन्दर छपाई, चमकदार स्टूडियो, ऊंची आवाज़ वाले एंकर और प्रायोजित बहसें किस काम आएंगी?
और अब बात उस राजनीतिक दल की, जिसे काकरोच जनता पार्टी के नाम से दुनिया जान रही है। इतिहास बताता है कि छात्र आंदोलनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती जीत हार नहीं बल्कि उसके बाद अपनी विश्वसनीयता और एकता बनाए रखना होती है। यदि वे आंतरिक मतभेदों, नेतृत्व के लिए आपसी संघर्ष अथवा राजनीतिक ध्रुवीकरण का शिकार हो जाते हैं, तो उनका प्रभाव तेजी से घट जाता है। हां यदि वे शांतिपूर्ण तरीके से समय-समय पर नए आंदोलनों का नेतृत्व भी करते हैं तो लंबे समय तक जन समर्थन हासिल कर सकते हैं। अब यह इस पार्टी के रहनुमाओं को तय करना है कि आगे भी वे जनहित के मुद्दों पर सक्रिय रहकर अपनी पहचान मजबूत करेंगे या फिर अपना तत्काल उद्देश्य पूरा होने के बाद धीरे-धीरे सार्वजनिक विमर्श से ओझल हो जाएंगे।
उधर, इस आंदोलन की सफलता का सबसे बड़ा असर अब आम आदमी के मनोविज्ञान पर दिखाई देगा। लंबे समय से यह धारणा बनाई जा रही थी कि विरोध का कोई अर्थ नहीं और सत्ता कभी नहीं सुनती। मगर जंतर मंतर ने इस सोच को बदल दिया है। अब किसान, बेरोजगार, शिक्षक, कर्मचारी, प्रतियोगी छात्र और दूसरे सामाजिक समूह भी यह महसूस करेंगे कि यदि आंदोलन शांतिपूर्ण, संगठित और व्यापक हो तो सत्ता को झुकाया जा सकता है। यही लोकतंत्र की असली ताकत है और यही हर सरकार के लिए सबसे बड़ा संदेश भी।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि एक मंत्री गया। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने सत्ता को याद दिलाया है कि लोकतंत्र में अंतिम हस्ताक्षर जनता के होते हैं और जनता का कोई व्यक्ति अथवा नेता माई बाप नहीं होता वरन् वह अपने भविष्य की इबारत खुद लिखना जानती है।