देश में जब आपातकाल की घोषणा हुई तब मेरी उम्र बामुश्किल 14 बरस थी मगर उसका अच्छा बुरा असर मेरी उम्र के किशोरों पर भी पड़ा था। शहर की पॉश मानी जाने वाली हमारी कॉलोनी कविनगर तब बसनी शुरू ही हुई थी। छोटी से छोटी चीज के लिए भी शहर जाना पड़ता था मगर चाह कर भी हम किशोर शहर नहीं जा पाते थे। उन दिनों बेल बॉटम का फैशन था और अफवाह यह थी कि शहर का कोतवाल पेंट की बड़ी मोरी देख ले तो कैंची से पेंट फाड़ देता है। जिसके बाल बड़े हों, वह तो कतई नहीं जा सकता था, क्योंकि बड़े बालों वालों को भी कोतवाल गंजा कर देता है, यह भी सुना जाता था। बेशक स्कूल में सभी मास्टर बिला नागा समय से आते थे और कायदे से पढ़ाई भी होती थी मगर अक्सर घर वाले स्कूल की छुट्टी करवा देते थे और कारण भी नहीं बताते थे। मगर उड़ती उड़ती खबर हम बच्चों तक पहुंच ही जाती थी कि स्कूल में आज नसबंदी करने वाले आ रहे हैं।
राशन की दुकान पर भी पूरा राशन और वह भी समय से मिलता था । इलाके में चोरी चकारी तो जैसे बंद ही हो गई थी। घर में चर्चा होती थी कि बहनों की शादी तक यदि इमरजेंसी लगी रही तो बिना किसी झंझट के सब काम हो जाएगा। दहेज दंडनीय अपराध था और ग्यारह आदमी से अधिक की बारात ले जाने पर भी सख्त मनाही थी। बारात को खाने में क्या दिया जाएगा, यह मेन्यू भी सरकार ने तय कर दिया था। महंगाई न के बराबर थी और काला बाजारी तो जैसे व्यापारी भूल ही गए थे। पूरा देश तीर की तरह सीधा नजर आ रहा था और पिताजी बताते थे कि क्या मजाल कि कोई सरकारी आदमी एक रुपए की भी रिश्वत मांग ले। कुल जमा सामान्य परिवार डरे हुए तो थे मगर भीतर ही भीतर खुश भी थे मगर नेतानुमा आदमी आपातकाल की खूब बुराई करते थे। वैसे मोहल्ले के कई नेता नुमा लोग जेल भेज दिए गए थे तो कई भूमिगत हो गए थे। हाल ही में 25 जून को भाजपा ने आपातकाल को फिर खूब कोसा। अखबारों में ‘संविधान हत्या दिवस’ के बड़े बड़े विज्ञापन दिखाई दिए तो तमाम शहर भी ऐसे ही होर्डिंग से पटा नजर आया । इस अवसर पर मुझ जैसे लोग भी अपने तरीके से आपातकाल को याद करते नजर आए ।
भारतीय इतिहास में आपातकाल एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज है, जिस पर आज भी बहस समाप्त नहीं हुई है। एक पक्ष इसे भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला दौर मानता है, तो दूसरा पक्ष यह तर्क देता है कि उसी काल में देश ने प्रशासनिक अनुशासन, व्यवस्था और निर्णय क्षमता का एक ऐसा अनुभव भी देखा, जो अभूतपूर्व था। प्रश्न यह है कि क्या बिना किसी बाहरी दबाव के हम अनुशासित नहीं रह सकते? सवाल यह भी है कि विरोधियों का दमन और उन्हें जेल भेजने का क्रम, सरकारी इदारों का राजनीतिक इस्तेमाल तो आज भी जारी है, तो क्या यह भी किसी किस्म का आपातकाल ही है? क्या भारत में लोकतंत्र केवल संवैधानिक व्यवस्था है अथवा व्यवहारिक रूप से भी हम लोकतांत्रिक देश ही हैं? बेशक 1975 के आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकार सीमित कर दिए गए, प्रेस पर सेंसरशिप लागू हुई, विपक्षी नेताओं को जेलों में डाला गया और असहमति के स्वर को राज्य शक्ति के माध्यम से नियंत्रित किया गया मगर फिर भी ऐसा क्या है कि हम एक उदाहरण के रूप में उसे याद करते हैं? क्या यह भी कुछ वैसा ही है जैसा हमारे बुजुर्ग किसी बुरी स्थिति पर कह उठते थे कि इससे अच्छा तो अंग्रेजों का राज था? समझ नहीं आता कि क्या संविधान में ही लिखा है कि केवल आपातकाल में ही महंगाई रोकी जा सकती है और भ्रष्टाचार सिर्फ इमरजेंसी में ही प्रतिबंधित होगा? आपातकाल में लगभग एक लाख लोगों को अकारण जेल भेज दिया गया था और वे लोग आज भी लोकतंत्र सेनानी कहलाते हैं तथा सरकार उन्हें पेंशन और तमाम सुविधाएं देती है। आज के दौर में राजनीतिक असहमति के चलते जो अनगिनत लोग जेलों में सड़ रहे हैं, क्या उन्हें भी कभी कोई नाम हमारा इतिहास देगा? क्या लोकतंत्र केवल चुनावों का ही नाम है अथवा असहमति को स्थान देने, संस्थाओं की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने, प्रेस की निर्भीकता बनाए रखने और नागरिकों को बिना भय के अपनी बात कहने का अधिकार देने का भी लोकतंत्र से कोई लेना देना है? सवाल यह भी है कि क्या हमारे कथित लोकतंत्र की आत्मा भी उतनी ही सशक्त है जितनी उसकी संवैधानिक संरचना? यकीनन अनुशासन और स्वतंत्रता के बीच संतुलन ही किसी भी आधुनिक लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी हो सकता है। भय से उत्पन्न व्यवस्था क्षणिक हो सकती है, लेकिन अधिकारों और जिम्मेदारियों पर आधारित सामाजिक अनुशासन ही स्थायी होता है। आज जब भारत स्वयं को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में प्रस्तुत करता है, तब यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है कि क्या हम केवल लोकतंत्र का दावा कर रहे हैं, या वास्तव में उसकी आत्मा को भी जीवित रखे हुए हैं? क्या यही प्रश्न हमारे वर्तमान और भविष्य, दोनों की दिशा तय नहीं करेगा ?