आम तौर पर माना जाता है कि अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों और उत्तर पूर्व भारतीयों के बीच डबल कॉन्शसनेस यानी द्वैत चेतना काम करती है और इनसे संबंधित व्यक्ति स्वयं को दो दृष्टियों से एक साथ देखने लगता है ।
पहला अपनी नजऱ से, जैसा वह स्वयं को समझता है और दूसरा समाज की नजऱ से। विशेषकर उस बहुसंख्यक या प्रभुत्वशाली समूह की नजऱ से जो अक्सर उसे संदेह, पूर्वाग्रह या हीनता की दृष्टि से देखता है। मगर कभी कभी यह समाजशास्त्रीय और दार्शनिक अवधारणा फेल हो जाती है और इंसान की मूल भावनाओं में शुमार करुणा, सहानुभूति और आपात स्थिति में किसी अजनबी की मदद करने की प्रवृति जोर मारने लगती है और इंसान रियाजउद्दीन मंसूरी बन कर देवता सरीखा हो जाता है। यह रियाजुद्दीन वही हैं जिन्होंने दिल्ली होटल अग्निकांड में बिना धर्म पूछे दर्जन भर लोगों की जान बचाई। उन्होंने अपने दुकान के मोटे मोटे गद्दों को आग लगे होटल के चारों तरफ बिछा दिया जिस पर कूद कर लोग अपना जीवन बचा सके। हालांकि 21 लोग इतने भाग्यशाली नहीं थे और यह भीषण अग्निकांड उन्हें लील गया । अब कई जगह छपा देखा कि मुस्लिम होकर भी हिंदुओं की रियाजुद्दीन ने जान बचाई। इसे पढ़ कर बेहद तकलीफ हुई और इसकी लानत मलामत करने से खुद को रोक नहीं पा रहा।
अफ्रीकी-अमेरिकी विचारक डू बॉयस ने 1903 में अपनी पुस्तक ‘द सोल ऑफ ब्लैक फोक’ में दुनिया को एक नजरिया दिया कि रंग भेद का शिकार लोगों और अल्पसंख्यकों के समक्ष हमेशा यह दबाव बना रहता कि बहुसंख्यक उसे किस नजऱ से देख रहे हैं? यह नजरिया भारत जैसे देश में दलितों, आदिवासियों और नस्ली तौर पर भिन्न सुदूर राज्यों के बाशिंदों को भी इसमें शामिल कर लेता है। उनके समक्ष सदैव यह चुनौती होती है कि लोग मेरी बात को मेरी पहचान के चश्मे से तो नहीं देखेंगे? क्या मुझे पहले अपनी देशभक्ति साबित करनी पड़ेगी? क्या गुस्सा जताने पर मुझे कट्टर, असभ्य या कृतघ्न समझा जाएगा? यानी वह अपनी बात कहने और कोई कदम उठाने के साथ-साथ लगातार दूसरों की संभावित प्रतिक्रिया का भी हिसाब लगा रहा होता है। उसे स्वयं पर अतिरिक्त निगरानी रखनी पड़ती है और हर वक्त अपने व्यवहार को नियंत्रित करना पड़ता है। जाहिर है कि दूसरों के पूर्वाग्रहों को ध्यान में रखकर ही बोलना पड़ता है और अपनी वास्तविक भावनाओं को दबाना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति अपनी देशभक्ति बार-बार साबित करता है, अपने समुदाय पर बने मजाकों पर भी हँस देता है, विवादास्पद मुद्दों पर अतिरिक्त सावधानी बरतता है तथा यह सोचकर बोलता है कि कहीं उसकी पूरी बिरादरी का मूल्यांकन उसकी वजह से न होने लगे। मगर हमारा सौभाग्य है कि हमारे बीच रियाजउद्दीन जैसे लोग भी हैं जो सामाजिक जीवन शैली की इस बीमारी द्वैत चेतना से नहीं वरन् इंसान की मूल भावना करुणा से संचालित होते हैं?
मनोविज्ञान और जीवविज्ञान के अध्ययन बताते हैं कि मनुष्यों में जन्मजात रूप से सहानुभूति की भावना होती है। जब हम किसी को पीड़ा में देखते हैं, तो हमारे मस्तिष्क के कुछ हिस्से वैसे ही सक्रिय हो जाते हैं जैसे स्वयं पीड़ा महसूस करने पर होते हैं। यही कारण है कि अक्सर हम लोग बिना किसी लाभ की उम्मीद के किसी अजनबी की भी सहायता कर देते हैं। कुछ अनजान लोग इसे धर्मों की सीख आदि से जोड़ देते हैं मगर यह भावना हमारे विकासवाद का ही मूल रूप से हिस्सा है । हजारों वर्षों तक समूहों में रहते हुए हमने सहयोग और पारस्परिक सहायता को अपने जीवित रहने की संभावना से जुड़ा हुआ पाया। बेशक धर्मों ने इस प्राकृतिक मानवीय भावना को व्यवस्थित और व्यापक बनाया मगर फिर भी इस भावना को धर्मों की उपज तो कतई नहीं कह सकते । दुनिया भर में अनेक लोग जो किसी धर्म का पालन नहीं करते, वे भी दूसरों की सहायता करते हैं, रक्तदान करते हैं, राहत कार्यों में भाग लेते हैं और मानव सेवा करते हैं। यही कारण तो है कि किसी सडक़ दुर्घटना, बाढ़ या भूकंप के समय हम लोग अक्सर जाति, धर्म, भाषा और परिचय की सीमाओं से ऊपर उठकर सहायता के लिए आगे आ जाते हैं और उस क्षण हम पहले ‘मनुष्य’ होते हैं, बाकी पहचानें बाद में आती हैं।
आजकल लोग अक्सर किसी व्यक्ति के कार्य को उसकी कम्युनिटी से जोड़ कर देखते हैं । यदि कुछ बुरा हुआ तो सारी लानत मलामत उस कम्युनिटी के नाम और अच्छा हुआ तब भी व्यक्ति की कम्युनिटी का जिक्र जरूर करते हैं लेकिन असलियत ये है कि इंसानियत हर धर्म से ऊपर है। इंसानियत ने अपने लिए धर्म बनाए हैं, धर्मों ने इंसान को इंसान नहीं बनाया। रियाजुद्दीन जैसे लोग इसकी जीती जागती मिसाल हैं। ऐसे में रियाजुद्दीन भाई और उनके बेटे के साथ साथ इंसान की मूल भावना करुणा को भी सलाम दर सलाम ।