आईपीएस के तबादले
कल वरिष्ठ आईपीएस अफसरों के तबादले हुए उसमें कुछ ऐसे नाम भी थे जो कमिश्नरेट में पुलिस आयुक्त बनने के सपने देख रहे थे। मतलब जो बेचते थे दवा-ए-दर्दे दिल वो अपनी दुकान बढ़ा चले। दरअसल, गाजियाबाद और गौतमबुद्घनगर ऐसी कमिश्नरेट है जहां पर हर कोई तैनाती चाहता है। दरअसल, ये दिल्ली के निकट होने के कारण यहां पर हर तरह की व्यवस्था है। आगरा, लखनऊ, प्रयागराज, वाराणसी ऐसी पुलिस कमिश्नरेट है जहां के पुलिस आयुक्त हमेशा वीवीआईपी की नजर में रहते हैं और बहुत दबाव महसूस करते हैं। गाजियाबाद और नोएडा तो बहुत शांतिप्रिय कमिश्नरेट है। यहां तो कमांड से ही पूरी कमिश्नरेट चल जाती है। इन दोनों कमिश्नरेट में अपराध भी ज्यादा नहीं होते हैं। पहले किसी जमाने में अपराधों की बाढ़ थी और फिल्में तक बनी। लेकिन अब 2017 से यहां अपराधों में कमी आयी है। हालांकि साइबर अपराध बहुत बढ़ गये हैं। लेकिन उनकी गिनती हीन्यिस क्राइम में नहीं होती। इसीलिए यहां पोस्टिंग अच्छी मानी जाती है। गौतमबुद्घनगर की पुलिस आयुक्त लक्ष्मी सिंह को कमिश्नरेट में तीन साल से अधिक हो गये हैं। उनका कार्यकाल बहुत ही सराहनीय चल रहा है। कोई भी दल हो उसका कोई जनप्रतिनिधि पुलिस आयुक्त से नाराज नहीं है। आम जनता में भी लक्ष्मी सिंह की अच्छी छवि है। यही कारण है कि वो लंबी पारी खेल पायी हैं। वैसे भी वो बहुत मजबूत पकड़ रखती है। लोगों को लगता था कि जो लिस्ट आयी है इसमें उनका नाम होगा। हालांकि मेरठ जोन के एडीजी हटा दिये गये। उनकी जगह पर किसी की तैनाती नहीं हुई है। ये भी संभावना है कि उन्हें मेरठ जोन की कमान दी जा सकती है। लेकिन अभी सब चर्चा में है। सूत्र बताते हैं कि वो दिसंबर तक पुलिस आयुक्त के पद पर बनी रहेंगी। चुनाव आयोग ही उन्हें तीन वर्ष पूरे होने पर हटा सकता है वरना लखनऊ वाले उनको टच नहीं करेंगे। क्योंकि एक तो उनका अच्छा काम दूसरी उनकी मजबूत पकड़। ये भी हो सकता है कि मेरठ जोन के एडीजी के साथ वो पुलिस आयुक्त का भी काम देखती रहे क्योंकि लक्ष्मी सिंह वर्तमान में एडीजी हैं। अब देखना है कि कौन किसको जोर का झटका धीरे से दे सकता है। जो लोग लग रहे थे उनको साइड पोस्टिंग मिल गई है। इससे उनकी परोकारी का और दावेदारी का अंदाजा लगाया जा सकता। जय हिंद