भाजपा मैदान में, लेकिन बसपा, सपा और कांग्रेस आखिर किस रणनीति पर काम कर रही हैं?
राकेश जयंत
गाजियाबाद (युग करवट)। उत्तर प्रदेश की राजनीति में गाजियाबाद हमेशा से बड़ा राजनीतिक केंद्र माना जाता रहा है। दिल्ली से सटा यह जिला केवल विकास और उद्योग का केंद्र नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करने वाला अहम क्षेत्र भी माना जाता है। लेकिन 2027 विधानसभा चुनाव से पहले जिस तरह का राजनीतिक माहौल बनना चाहिए था, वैसा माहौल फिलहाल दिखाई नहीं दे रहा। सबसे ज्यादा सवाल बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की गाजियाबाद इकाइयों को लेकर उठ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनाव केवल वोटिंग के दिन नहीं जीते जाते, बल्कि उसकी नींव कई साल पहले सडक़ पर संघर्ष, जनता के मुद्दों और संगठन की मजबूती से रखी जाती है। लेकिन गाजियाबाद में विपक्षी दलों की गतिविधियां बेहद सीमित दिखाई दे रही हैं। गाजियाबाद में बेरोजगारी, महंगाई, प्रदूषण, ट्रैफिक जाम, अवैध कॉलोनियां, जलभराव, बिजली कटौती और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में रहते हैं। लोनी से लेकर साहिबाबाद और मुरादनगर से लेकर इंदिरापुरम तक जनता रोजमर्रा की समस्याओं से परेशान है। लेकिन सवाल यह है कि इन मुद्दों पर विपक्ष की बड़ी लड़ाई आखिर कहां है? न तो कोई बड़ा जनआंदोलन दिखाई देता है, न लगातार धरना-प्रदर्शन और न ही ऐसा कोई अभियान जिससे जनता को लगे कि विपक्ष उनके बीच मजबूती से खड़ा है। भाजपा लगातार एक्टिव, विपक्ष रिएक्शन मोड में है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि भाजपा ने बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत कर रखा है। पार्टी लगातार कार्यक्रम, जनसंपर्क और सामाजिक समीकरणों पर काम कर रही है। इसके उलट बसपा, सपा और कांग्रेस अभी तक स्पष्ट रणनीति के साथ मैदान में उतरती नहीं दिख रहीं। कई जगहों पर कार्यकर्ताओं में भी निराशा दिखाई देती है क्योंकि स्थानीय स्तर पर संगठनात्मक सक्रियता कम नजर आ रही है।
बसपा की चुप्पी सबसे ज्यादा चर्चा में
एक समय गाजियाबाद में बहुजन समाज पार्टी का मजबूत जनाधार माना जाता था। दलित और पिछड़े वर्ग में पार्टी की पकड़ चर्चा का विषय रहती थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पार्टी की जमीनी सक्रियता बेहद सीमित दिखाई दी है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि यदि बसपा ने समय रहते जनता के मुद्दों पर सडक़ पर उतरकर संघर्ष शुरू नहीं किया तो उसका पारंपरिक वोट बैंक भी धीरे-धीरे कमजोर हो सकता है।
सपा में संगठन मजबूत करने की चुनौती
समाजवादी पार्टी ने पिछले चुनावों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी, लेकिन गाजियाबाद में पार्टी अभी तक वैसा बड़ा राजनीतिक आंदोलन खड़ा नहीं कर पाई जिससे भाजपा को सीधी चुनौती मिल सके। युवा, व्यापारी और पिछड़े वर्ग के बीच पकड़ मजबूत करने के लिए जिस स्तर की आक्रामक राजनीति की जरूरत है, वह फिलहाल दिखाई नहीं दे रही।
कांग्रेस की हालत और ज्यादा कमजोर
कांग्रेस पार्टी शहर में कभी मजबूत राजनीतिक पहचान रखती थी, लेकिन वर्तमान में संगठनात्मक स्तर पर पार्टी काफी कमजोर नजर आती है। बड़े नेताओं के दौरे और प्रेस कॉन्फ्रेंस तो दिखाई देते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर लगातार आंदोलन और जनसंपर्क की कमी साफ महसूस होती है।
जनता पूछ रही बड़ा सवाल
गाजियाबाद की जनता अब यह पूछने लगी है कि अगर विपक्ष अभी से जनता के मुद्दों पर संघर्ष करता नहीं दिख रहा, तो चुनाव के समय जनता उसके साथ क्यों खड़ी होगी? राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि 2027 का चुनाव केवल जातीय समीकरणों से नहीं, बल्कि जमीनी सक्रियता और जनता के विश्वास से तय होगा। यदि विपक्ष इसी तरह निष्क्रिय बना रहा तो भाजपा को सीधी चुनौती देना बेहद मुश्किल हो सकता है। आने वाले महीनों में यह साफ हो जाएगा कि बसपा, सपा और कांग्रेस गाजियाबाद में सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहेंगी या वास्तव में सडक़ पर उतरकर राजनीतिक माहौल बनाएंगी।