पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत
पश्चिम बंगाल की जीत से भाजपा के अंदर खासकर दिल्ली वालों के अंदर एक अजीब सा जोश पैदा हो गया। कार्यकर्ताओं के अंदर उत्साह बढ़ गया। हालांकि कार्यकर्ता तो दस साल से पार्टी का झंड़ा बुलंद किये हुए हैं लेकिन अभी तक उसके खास अच्छे दिन नहीं आये हैं। पश्चिम बंगाल की जीत में कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका रही है। चुनाव प्रचार के लिए गये यूपी के नेताओं ने नाम ना छापने की शर्त पर बहुत कुछ बताया। उनका कहना था कि पश्चिम बंगाल संगठन की अहम भूमिका रही है और ऐसे लोगों को मंडल अध्यक्ष से लेकर बड़े पदों तक की जिम्मेदारियां दी गई जो एक लंबे समय से पार्टी से जुड़े थे। उन्होंने अच्छे दिनों की उम्मीद नहीं छोड़ी थी। सर्दी, गर्मी, बरसात में पार्टी का झंड़ा बुलंद किये रहे। लेकिन उत्तर प्रदेश का मिजाज बिल्कुल अलग है। पश्चिम बंगाल की जीत के बाद इस बात की चर्चा होने लगी है कि यूपी भी अब फतह होगा और तीसरी बार सरकार बनेगी। लेकिन जमीनी हकीकत यूपी की बिल्कुल अलग है। यहां का मिजाज अलग है। पश्चिम बंगाल में जातिवाद का कोई जहर नहीं है, कोई हिंदू-मुस्लिम माहौल नहीं है। वहां का हर नागरिक केवल और केवल बंगाली है। गाजियाबाद से सांसद अतुल गर्ग साफतौर पर कहते हैं कि पश्चिम बंगाल का चुनाव हिंदू-मुस्लिम के बल पर जीता ही नहीं गया। उनका साफ तौर कहना है कि वहां पर ऐसा माहौल दिखाई ही नहीं दिया। इसीलिए मेरा मानना है कि यूपी का मिजाज बिल्कुल अलग है। २०१७ से यूपी में भाजपा की सरकार है, कानून व्यवस्था अच्छी है लेकिन जातिवाद को लेकर अंदरखाने जो कुछ पक रहा है वो पार्टी के लिए अच्छा संकेत नहीं है। सरकार और संगठन में जितनी गुटबाजी है वो भी सबके सामने है। सरकार के मुखिया और उपमुख्यमंत्रियों के बीच छत्तीस का आंकड़ा सबके सामने है इसलिए पश्चिम बंगाल की जीत के बाद यूपी फतह करने के लिए जमीनीतौर पर बहुत कुछ बदलाव करने होंगे। दो साल से कोई मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं हुआ है। समर्पित कार्यकर्ताओं को कहीं एडजस्ट नहीं किया जा रहा है। विधायकों की और मंत्रियों की कोई सुनवाई नहीं है। इसीलिए पहले घर को ठीक करना जरूरी है। सही तरीके से साफ-सफाई हुई तो फिर परिणाम अच्छे हो सकते हैं। दिल्ली और लखनऊ के बीच तल्खी भी सभी के सामने है। इसलिए पश्चिम बंगाल की जीत का रास्ता यूपी में कितना सफल होगा अभी ये कहना जल्दबाजी है। जय हिंद