गाजियाबाद के नंदग्राम थाना क्षेत्र में 16 मार्च को एक बड़ी आपराधिक वारदात हुई। चार साल की मासूम लडक़ी को आरोपी जिसका नाम गौरव है, उसने मासूम को घर के बाहर खेलते समय अगवा कर लिया। आरोपी युवक ने उस मासूम लडक़ी को एक सुनसान जगह पर ले जाकर उससे बलात्कार किया और ईंट से उसके सिर पर बार-बार वार कर उसकी हत्या कर दी। शव उसके घर से लगभग 500 मीटर दूर झाडिय़ों में मिला। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बच्ची के शरीर पर 11 निशान चोटों के पाए गए, जिसमें सिर पर तीन वार, गला घोंटने के संकेत, काटने के निशान और जननांगों पर चोटें शामिल थीं। इस घटना में पुलिस का पक्ष समझें तो अदालत में बीएनएस की धारा 103 (हत्या), 238(ए) (अपराध के सबूतों को गायब करने या अपराधियों को बचाने के लिए झूठी जानकारी देने), 66 (मृत्यु का कारण बनने या पीडि़त की स्थायी वनस्पति अवस्था में पहुंचने की सजा) के तहत 900 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की, साथ ही 5/6 पॉक्सो एक्ट और एससी-एसटी एक्ट की संबंधित धाराएं बढ़ाई गई हैं। पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में आरोपी पैर में गोली लगने से घायल हो गया। अब पीडि़त पक्ष अर्थात बच्ची के पिता के पक्ष पर भी गौर कीजिए। बच्ची के पिता और परिजनों का कहना है कि वह नंदग्राम थाना पुलिस की कार्रवाई से संतुष्टï नहीं हैं। अब अगर कोई पीडि़त यह कहे कि वो पुलिस की कार्रवाई से संतुष्टï नहीं है तो इसका कारण पुलिस को ही पता होगा। अगर कोई पीडि़त पुलिस की कार्रवाई से संतुष्टï नहीं है, तो पुलिस का नैतिक और मानवीय कर्तव्य है कि उसे संतुष्टï करे। पूरी कार्रवाई से उसे अवगत कराए, उसे बताया जाए कि आरोप सिद्घ हो जाने के बाद अभियुक्त को कितनी सजा मिलेगी। यदि पुलिस ऐसा करने में नाकाम रहती है तो उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठेंगे ही। गाजियाबाद पुलिस कमिश्नरेट के अधिकारियों को इस पर ध्यान देना चाहिए।