समाजवादी पार्टी में एक बात कही जाती है कि राजनीति में चर्चा, खर्चा और पर्चा का बडा महत्व होता है। मेरा मानना है कि खर्चा हर कोई कर नहीं पाता, पर्चा सबके नसीब में नहीं होता, इसलिए ले दे कर चर्चा बचती है जिस पर सभी का अधिकार है। अब भाजपा की कमेटी घोषित हो और चर्चा ना बने तो बात ही क्या रही? चर्चा यह है कि महानगर अध्यक्ष मयंक गोयल की जो टीम घोषित हुई है, उसमें चली किसकी? मतलब यह कि कौन-कौन जनप्रतिनिधि अपने चहेतों को भाजपा की महानगर कमेटी में जगह दिला पाए? किसी का कहना है कि सांसद अतुल गर्ग अपने चाहने वालों को पद दिलाने में सफल रहे। किसी का कहना है बाजी तो कैबिनेट मंत्री सुनील शर्मा के हाथ लगी है। कोई दावा कर रहा है कि विधायक अजितपाल त्यागी के लोगों को स्थान दिया गया है। मगर कोई यह नहीं बता रहा है कि एमएलसी दिनेश गोयल और स्वतंत्र प्रभार मंत्री नरेन्द्र कश्यप ने भी किसी को पद दिलाया है या नहीं। कहा जा रहा है कि ये दोनों तो साइलेंट काम कर देते हैं। नामित पार्षद के मामले में भी बड़ी चर्चा है कि यह लिस्ट तो वही है जिसे संजीव शर्मा ने महानगर अध्यक्ष रहते बनाई गई थी। अब आप गणित समझिये अगर कोई विधायक का आदमी है, कोई सांसद का है और कोई किसी मंत्री का है, तो फिर पार्टी का कौन है? यदि कोई पार्टी का है ही नहीं तो मयंक गोयल कैसे संगठन की गाड़ी चला पाएंगे। बात यह भी थी कि पचास साल से अधिक उम्र के व्यक्ति को पद नहीं मिलेगा, मगर भाजपा महानगर कमेटी में यह मिथक भी टूटा है। क्योंकि पचास से अधिक उम्र के व्यक्ति को भी पद मिला है। चर्चा यह भी है कि कई नाम ऐसे हैं जो महानगर कमेटी में जाना डिजर्व करते हैं, मगर उनको पद नहीं मिला। शायद इसलिए कि उनके पास अच्छी सोर्स नहीं थी। कहा जा रहा है कि एक बार साबित हो गया कि आज की भाजपा में बिना ऊपर की पकड़ के कुछ भी पाना संभव नहीं है। नामित पार्षदों की तो एक अन्य समस्या यह भी है कि अगले साल विधानसभा चुनाव है। चुनाव के परिणाम के साथ ही उनका कार्यकाल भी समाप्त हो जाएगा। मतलब ये लोग सालभर के ही पार्षद हैं और बहुत कम संभावना है कि इन्हें कोई बोर्ड बैठक भी मिलेगी।