अविश्वास प्रस्ताव
जब संवैधानिक पद पर बैठे लोगों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस जाने लगे तो फिर ये लोकतंत्र के लिए अच्छा संदेश नहीं है। भले ही अविश्वास प्रस्ताव गिर जाते हों लेकिन एक खाई जरूर पैदा हो जाती है और समाज में भी एक अलग ही संदेश जाता है। संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की भी जिम्मेदारी है कि अपनी कार्यप्रणाली से ऐसा कोई संदेश ना दें जिसमें इस तरह की नौबत आ जाए। अगर संवैधानिक पद पर बैठे लोगों के प्रति अविश्वास पैदा होगा तो फिर देश में क्या बचेगा। इसलिए जरूरी है कि राजनीति से ऊपर उठकर संवैधानिक पदों पर बैठे लोग अपनी जिम्मेदारी भी समझे और जो लोग राजनीति के चक्कर में अविश्वास प्रस्ताव लाते हैं वो अपनी सोच बदले और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों पर भरोसा करें। मुझे याद है कि जब संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ दशकों में अविश्वास प्रस्ताव आता था तो उसका बहुत गहरा संदेश समाज में जाता था। अभी लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया था हालांकि वो ध्वनि मत से गिर गया लेकिन संदेश जो जाना था वो चला गया। अब देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी है। राज्यसभा के 63 और लोकसभा के 130 सांसदों ने अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किये हैं। अब सवाल उठता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त का ये संवैधानिक पद आखिरकार क्या आवश्यकता पड़ी कि प्रस्ताव लाया जा रहा है, ये अपने आप में बड़ा सवाल है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस तरह के प्रस्ताव अच्छा संदेश नहीं देते। संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की भी जिम्मेदारी है कि वो निष्पक्षत, पारदर्शिता के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाएं और कहीं भी ऐसा महसूस ना करायें कि कहीं किसी के साथ भेदभाव हो रहा है। हालांकि कभी-कभी जो दिखाई देता है हकीकत में ऐसा नहीं होता। दोनों बड़े संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आना सरकार की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है। बहरहाल, विश्वास को मजबूत करना पड़ेगा और विश्वास भी करना पड़ेगा तभी हमारा लोकतंत्र और मजबूत होगा।
जय हिंद