गौर से देखिए इजराइल अमेरिका बनाम ईरान के मामले में भारत की चुप्पी शब्दों से अधिक बोल रही है। बोल ही नहीं रही वरन् चीख चीख कर कह रही है राष्ट्रीय स्वाभिमान जैसे शब्द अब हमारे लिए बेमानी हो चुके हैं। भारतीय नेतृत्व जो कभी जनता को विश्व गुरू बनने का सपना दिखाता था, अब अमेरिकी तंज और आदेशों पर पुराने ज़माने की औपनिवेशिक शिष्टता पर उतर आया है। जिस युद्ध से पूरी दुनिया हिली हुई है और मानवीय सभ्यता के सिर पर तीसरे विश्व युद्ध का संकट मंडरा रहा है, उस पर हमारे नेताओं की रहस्यमयी चुप्पी करोड़ों लोगों को बेचैन कर रही है। क्या यह सब देखकर इतिहास मुस्कुरा नहीं रहा होगा कि जिस देश ने दशकों तक गुटनिरपेक्षता का झंडा उठाया, जो सदैव अपने फैसले लेता रहा, जिसने कई बार प्रतिबंध झेले मगर गर्दन नहीं झुकाई , वही आज रूस से तेल खरीदने की अमेरिकी ‘इजाज़त’ पाकर धन्य हुआ जा रहा है। चलिए, ताली बजाइए ‘56 इंच की छाती’ ने अपना मास्टर स्टोक खेल दिया है और पूरा जोर लगा कर भारतीय विदेश नीति का कंपास वॉशिंगटन की दिशा के अनुरूप सेट कर दिया है।
किसी की समझ नहीं आ रहा कि आज के इस दौर में जब देश के भीतर राष्ट्रवाद का तापमान 45 डिग्री पर रहता है, तब अंतरराष्ट्रीय मंच पर हमारा थर्मामीटर अचानक ठंडा क्यों पड़ रहा है ? पाकिस्तान से हमारी लड़ाई हो तो अमेरिकी राष्ट्रपति बार बार कहता था कि मैने युद्ध रुकवा दिया। मोदी जी को अपना दोस्त बताता है मगर अपने शपथ ग्रहण समारोह में बुलाया तक नहीं। कोविड के दौर में धमका कर हमसे दवाइयां अपने यहां मंगवा लेता है। कभी टैरिफ लगाता है तो कभी कहता है कि मैं मोदी जी का करियर बर्बाद कर सकता हूं। अब तो हद ही हो गई है और उसने रूस से तेल खरीदने की छूट जैसे शब्द इस्तेमाल कर देश के अहम को ही ठेस पहुंचा दी है। हो सकता है कि बार बार अपमान सहने की मोदी जी की कोई मजबूरी हो मगर देश की तो ऐसी कोई मजबूरी नजर नहीं आती जो इस कड़वे घूँट को पीये । सही तो कह रहा है अमेरिकी मीडिया कि भारत ने इजराइल के मामले में अपनी टाँगे खोल दी हैं । क्या गलत है जब कांग्रेस मजाक उड़ाती है कि हर हर मोदी नहीं थर थर मोदी हो रहा है। बुरे वक्त के हमारे साथी ईरान के सर्वोच्च नेता और उसके तमाम संगी साथियों को अमेरिका और इजरायल ने बारूद से उड़ा दिया मगर मोदी जी के मुंह से आवाज तक नहीं निकली। हमारे मेहमान ईरानी जहाज को अमेरिका ने डुबो दिया, सौ से अधिक लोग मारे गए मगर हमने मुंह नहीं खोला और अब रशिया से एक महीने तक तेल खरीदने की छूट देने की घोषणा पर भी चुप्पी ने पूरे देश को तिलमिला कर रख दिया है।
उधर, देश दुनिया में हमारी रही सही इज्जत भारतीय मीडिया धूलधूसरित किए दे रहा है। यह वही देश है जहां टीवी स्टूडियो में एंकर हर रात पाकिस्तान, चीन और कभी-कभी मंगल ग्रह तक को सबक सिखा देते हैं। लेकिन अब जब बात अमेरिका की आई है तो वही एंकर अचानक योग गुरु बने घूम रहे हैं ‘शांत रहिए, धैर्य रखिए, यह सब कूटनीति है।’ सच कहें तो भारतीय राजनीति ने चुप्पी को भी एक कला बना दिया है। पहले नेता बोलकर विवाद पैदा करते थे, अब न बोलकर रहस्य पैदा करते हैं। काश कोई उन्हें बताए कि रहस्य जितना गहरा होता है, उतनी ही ज्यादा अफवाहें पैदा होती हैं। अफवाहें चीख चीख कर कहती हैं कि इस चुप्पी के पीछे एपस्टीन अथवा गौतम अदाणी जैसी कुछ फाइलें हैं । सच्चाई क्या है, यह शायद उन फाइलों को ही पता होगा जो हमेशा ‘राष्ट्रीय हित’ के नाम पर बंद अलमारी में हैं। कुछ भी हो मगर एक भारतीय के रूप में हमें शर्मिंदा करने का हक तो किसी को नहीं होना चाहिए। कम कम से कम उन्हें तो जिन्होंने देश को दशक भर झूठा दंभ परोसा और अब एन मौके पर मिमियाने लगे।