खबर है कि 2026 में छुट्टियों को लेकर जारी नए इंडेक्स में भारत दुनिया के 190 देशों की सूची में सबसे ऊपर है। भारत में हर साल लगभग 42 सार्वजनिक छुट्टियां होती हैं जबकि दुनिया का औसत मात्र 13 छुट्टियों का है। कोई हैरानी की बात नहीं कि विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश अमेरिका छुट्टियों के मामले में सबसे नीचे है और वहां मात्र 9 सार्वजनिक छुट्टियां होती हैं। हो सकता है कि भारत में होने वाली इतनी अधिक छुट्टियां सांस्कृतिक उत्सवों, विभिन्न धर्मों के सम्मान, विविधता और परंपराओं के कारण अवश्यंभावी हो चुकी हों मगर क्या कभी इस पर भी विचार होगा कि आखिर इन छुट्टियों की कीमत कौन चुका रहा है? क्या इतनी अधिक सार्वजनिक छुट्टियों का बोझ भारत जैसे विकासशील राष्ट्र के लिए आत्मघाती विलासिता तो नहीं बनती जा रही? अपने अपने वोट बैंक को खुश करने के लिए केंद्र और राज्यों द्वारा हर साल इन सार्वजनिक छुट्टियों में और इजाफा किया जाना कहीं धीरे-धीरे राष्ट्र की कार्यक्षमता पर अदृश्य लेकिन गहरा प्रहार तो नहीं छोड़ रहा? क्या इसे विडंबना ही नहीं कहेंगे कि जिस देश को तेज़ आर्थिक प्रगति, प्रशासनिक दक्षता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की सबसे अधिक आवश्यकता है, वही देश बार-बार स्वयं ही अपनी गति पर छुट्टियों के रूप में ब्रेक लगा देता है?
स्कूलों की बात करूँ तो शनिवार, रविवार, तमाम सार्वजनिक छुट्टिटयों, गर्मियों और सर्दियों की छुट्टियां, कांवड़ और स्थानीय त्यौहारों के अतिरिक्त अत्यधिक वर्षा, गर्मी, सर्दी अथवा कोहरे पर जिलाधिकारियों द्वारा घोषित छुट्टियाँ, पता नहीं बच्चे पढ़ते कब हैं? देश के रहनुमाओं को कब यह समझ आयेगा कि अत्यधिक छुट्टियाँ आर्थिक, प्रशासनिक और सामाजिक अनुशासन की शत्रु हैं। जब सरकारी कार्यालय, बैंक, न्यायालय और संस्थान बार-बार बंद होते हैं, तो केवल एक दिन का काम नहीं रुकता बल्कि पूरी व्यवस्था की गति टूट जाती है। फाइलें अटकती हैं, परियोजनाएँ रुकती हैं, निवेश निर्णय टलते हैं और छोटे व्यवसायों की नकदी प्रवाह पर सीधा आघात पड़ता है। जिस समय दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाएँ अमेरिका, जापान और चीन निरंतर उत्पादन और दक्षता बढ़ाने में लगी हुई हैं, हम अवकाशों की बढ़ती सूची को सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक मानकर संतुष्ट हो रहे हैं। हमारा यह आत्मसंतोष कितना आत्मघाती है, इस पर क्या कभी विचार होगा ? हमारा सरकारी तंत्र पहले ही धीमी गति के लिए बदनाम है। जब उस पर छुट्टियों का अतिरिक्त बोझ पड़ता है, तो नागरिक सेवाएँ लगभग ठहर सी जाती हैं। एक प्रमाण पत्र, एक अनुमति या एक साधारण सरकारी प्रक्रिया सब कुछ अनावश्यक रूप से लंबा खिंच जाता है। नागरिक कार्यालयों के चक्कर लगाते रहते हैं और जवाब मिलता है ‘आज छुट्टी है, कल आइए।’ यह केवल असुविधा नहीं, शासन की विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार है।
सबसे कठोर सच्चाई तो यह है कि छुट्टियों का यह ‘उत्सव’ सभी के लिए समान नहीं होता। संगठित क्षेत्र के कर्मचारी वेतन सहित अवकाश का आनंद लेते हैं, लेकिन असंगठित क्षेत्र के करोड़ों श्रमिकों के लिए हर छुट्टी आय की हानि है। दिहाड़ी मजदूर, छोटे दुकानदार, रिक्शा चालक, ठेले वाले इनके लिए अवकाश का अर्थ है खाली दिन और खाली जेब। यानी जो लोग पहले से आर्थिक रूप से कमजोर हैं, वे ही इस व्यवस्था की सबसे अधिक कीमत चुकाते हैं। क्या इसे सामाजिक न्याय कहा जा सकता है? पता नहीं राष्ट्र को किस प्रतीकात्मकता में उलझाया जा रहा है। हम उत्सव मनाने में जितनी ऊर्जा लगाते हैं, उतनी ऊर्जा संस्थागत सुधार, नवाचार और उत्पादकता बढ़ाने में क्यों नहीं लगाते? क्या इसका कारण यह तो नहीं कि अब धीरे-धीरे उत्सव ही अब हमारा उद्देश्य बन गया है और विकास जैसी बातें कहीं पीछे छूट रही हैं?
यह तर्क अक्सर दिया जाता है कि छुट्टियाँ मानसिक विश्राम और सांस्कृतिक एकता के लिए आवश्यक हैं। इसमें कोई संदेह भी नहीं है लेकिन आवश्यकता और अतिरेक में कुछ तो अंतर होता होगा ? विश्राम आवश्यक है मगर निरंतर ठहराव तो विनाशकारी है। संस्कृति महत्वपूर्ण है पर आर्थिक जड़ता के मूल्य पर तो नहीं। सम्मान जरूरी है पर अव्यवस्था के रूप में तो कदापि नहीं। क्या ही अच्छा हो कि हम छुट्टी के अधिकार को जिम्मेदारी से भी जोड़ सकें।